चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान को दी सैन्य कार्रवाई की धमकी

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान को दी सैन्य कार्रवाई की धमकी

बीजिंग: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एलान किया है कि ताइवान को चीन के साथ मिलना ही होगा। उन्होंने कहा है कि ताइवान की आजादी एक ‘त्रासदी’ होगी, इन्हीं शब्दों के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान और चीन के शांतिपूर्ण एकीकरण की बात दोहराई है। चीनी राष्ट्रपति ने धमकी भरे अंदाज में कहा कि एकीकरण के लिए वह सेना का इस्तेमाल न करने का वादा नहीं कर सकते।
बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ पीपल में ताइवान नीति से जुड़े कार्यक्रम के दौरान चीनी राष्ट्रपति ने कहा, ताइवान के सभी लोगों को साफ तौर पर इस बात का अहसास होना चाहिए कि ताइवान की आजादी ताइवान के लिए सिर्फ गंभीर त्रासदी लाएगी। हम शांतिपूर्ण एकीकरण के लिए व्यापक स्थान बनाने को तैयार हैं, लेकिन हम अलगाववादी गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ेंगे।

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चेतावनी भरे लहजे में शी ने यह भी कहा, ‘हम ताकत इस्तेमाल न करने का कोई वादा नहीं करते हैं और सभी जरूरी विकल्प को सुरक्षित रखते हैं।’ चीन ने ताइवान के साथ साथ अमेरिका को भी आंखें दिखाई हैं। शी ने कहा कि ताइवान चीन का अंदरूनी मामला है और उनका देश ‘बाहरी दखल’ को मंजूरी नहीं देगा।
शी जिनपिंग के बयान से एक दिन पहले ही ताइवान की राष्ट्रपति तसाई इंग-वेन ने कहा था कि बीजिंग को ताइवान के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए और शांतिपूर्ण ढंग से मतभेद सुलझाने चाहिए। तसाई ने कहा, चीन को ‘आजादी और लोकतंत्र में रह रहे 2.3 करोड़ लोगों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और हमारे आपसी मतभेदों को सुलझाने के लिए शांति और बराबरी का रास्ता अपनाना चाहिए।’

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चीन में दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1946 से 1949 तक राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्ट पीपुल्स आर्मी के बीच गृह युद्ध हुआ था। 1949 में खत्म हुए इस युद्ध में राष्ट्रवादी हारे और चीन की मुख्यभूमि से भागकर ताइवान नाम के द्वीप पर चले गए। उन्होंने ताइवान को एक स्वतंत्र देश घोषित किया और उसका आधिकारिक नाम रिपब्लिक ऑफ चाइना रखा। वहीं चीन का आधिकारिक नाम पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना है। दोनों पक्षों के बीच गहरे कारोबारी, सांस्कृतिक और निजी व्यक्तिगत संबंध हैं लेकिन लोकतंत्र के मुद्दे पर चीन और ताइवान में जमीन आसमान का फासला है। लोकतांत्रिक शासन पर चलने वाले ताइवान को एक पार्टी शासन वाले चीन के शासन में कोई रुचि नहीं है। चीन किसी तरह ताइवान को खुद में मिलाना चाहता है।

हाल के बरसों में चीन अपनी संप्रभुता को लेकर आक्रामक रुख दिखा रहा है। वह अन्य देशों को इस बात के लिए बाध्य भी करता है कि वे या तो चीन के साथ कूटनीतिक रिश्ते रखें या ताइवान के साथ। 2018 में चीन ने अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन कंपनियों और होटल कंपनियों को भी अपनी वेबसाइट पर ताइवान को चीन का हिस्सा बताने के लिए बाध्य किया। चीन को अमेरिका और ताइवान की नजदीकी परेशान करती है। अमेरिका, ताइवान को अपना करीबी साझेदार मानता है। चीन की चिंताओं के बावजूद वॉशिंगटन ताइपे को हथियार और अत्याधुनिक लड़ाकू विमान भी मुहैया कराता है। 2018 में अमेरिका ने ताइवान रिलेशंस एक्ट और ताइवान ट्रैवल एक्ट भी पास किए जिसके तहत दोनों देशों के आम नागरिक और उच्च अधिकारी एक दूसरे के यहां आसानी से आ जा सकते हैं। आधिकारिक रूप से अमेरिका ‘वन चाइना’ पॉलिसी को मानता है और कहता है कि वह ताइवान की आजादी का समर्थन नहीं करता है। असलियत यह है कि डब्ल्यूटीओ, एपेक, एशियाई विकास बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में वह ताइवान की सदस्यता का समर्थन करता है।