फाकडिंग में जो महसूस की मी पिरूक की तान और मानसून की पहली झड़ी, नहीं भूलेगा कभी

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Govind Pant Raju

लखनऊ:  जैसे-जैसे हम एवरेस्ट से वापस आ रहे थे रास्ते का रोमांच, उतना ही था, जितना जाते टाइम हमारे चेहरों पर थकावट की कोई शिकन नहीं थी। पिछली यात्रा तो आप पढ़ ही चुके हैं, आइए आपको आगे की यात्रा की ओर ले चलते हैं।

(राइटर दुनिया के पहले जर्नलिस्ट हैं, जो अंटार्कटिका  मिशन में शामिल हुए थे और उन्होंने वहां से रिपोर्टिंग की थी। )

नामचे बाजार के बीचों-बीच जो पानी की धारा बहती है, उसका एक स्रोत नामचे बाजार को छिपा लेने वाली पहाड़ी के नीचे भी दिखता है। जहां पर यह धारा फूटती है, वहीं पर पत्थरों को बिछा कर कपड़े धोने का इंतजाम किया गया है। भारवाही पशुओं के लिए वहीं पर एक बाड़ा भी है, जिसमें नामचे बाजार में भीड़ होने पर याक व ज्यो और खच्चरों को रात भर बांधने की सुविधा है। यह पानी यहां से नीचे बहता हुआ नामचे बाजार वाली धारा से मिल कर कुछ किलोमीटर नीचे बहने के बाद दूधकोशी में पहुंच जाता है। नामचे बाजार में बहने वाली धारा पूरी बस्ती की पानी की जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करती थी। लेकिन अब इस प्राकृतिक जल धारा को टाइल्स बिछा कर नाली का सा रूप दिया जा रहा है।

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सौंदर्यीकरण का यह काम यात्रियों से सगरमाथा नेशनल पार्क लिए जाने वाले शुल्क की रकम में से करवाया जा रहा है। कई स्थानीय लोगों को यह लगता है कि यह एक तरह की फिजूलखर्ची है और इसके जरिए खर्च की जा रही रकम को लेकर भ्रष्टाचार भी हो रहा है। सौंदर्यीकरण के बाद पानी की धारा का बहाव बढ़ जाएगा और इसके प्रवाह से धर्म चक्र भी घुमाए जाएंगे। लेकिन कुल मिलाकर नामचे की प्राकृतिक सुंदरता के बीच में जल धारा के साथ किया जा रहा टाइल्स का यह प्रयोग मखमल में टाट का सा पैबंद लगता है।

आगे की स्लाइड में जानिए एवरेस्ट के रास्तों में पाए जाने वाले पेड़ों से जुड़ी इंट्रेस्टिंग बातें

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