कथा सम्राट प्रेमचंद की जयंती पर उनको डिजिटल रूप में देख सकेगी दुनिया

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गोरखपुर:  ईदगाह का मेला और हामिद का भला किसे नहीं याद होगा। गोरखपुर में उसी ईदगाह के बगल में स्थित प्रेमचंद की यादो का संस्थान है। साहित्यकार इसे प्रेमचंद साहित्य संस्थान के नाम से जानते हैं।

इसको अब गोरखपुर का लमही भी कहा जाता है। अबकी कथा सम्राट की जयंती पर यहाँ बहुत कुछ नया शुरू हुआ है जिससे दुनिया प्रेमचंद को डिजिटल रूप में देख सकेगी। 1916 से 1921 तक गोरखपुर के जिस मकान में रहकर मुंशी प्रेमचंद ने निर्मला-सेवासदन जैसी रचनाओं को जन्म दिया, 137 वीं जयंती पर वहीं से उन्हें डिजिटाइजेशन की सौगात देने की तैयारी है।

प्रेमचंद साहित्य संस्थान की इस मुहिम में खास बात यह है कि प्रेमचंद के सभी 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, नाटक, लेख और इंटरव्यू सहित, उनसे जुड़ी सारी चीजों को एक ही प्लेटफार्म पर लाया जा रहा है। ताकि गूगल या किसी भी सर्च इंजन में प्रेमचंद का नाम लिखकर एंटर बटन दाबते ही उनसे जुड़ा सा कुछ नारों के सामने आ जाये। अभी उनका लिखा जितना कुछ इंटरनेट पर मौजूद है वो सा भी इससे लिंक होगा।

संस्थान से जुड़े डा.मुमताज खान कहते हैं, ऑनलाइन वर्जन ने साहित्य की उपलधता बढ़ाई और इसे सर्वसुलभ बनाया है। प्रेमचंद का निधन हुए आठ दशक गुजर चुके हैं। इतने वर्षों में दुनिया बहुत बदल गई लेकिन प्रेमचंद की कालजयी कहानियों के कथानक और चरित्र आज भी जगह-जगह मौजूद हैं। युवा पीढ़ी उनसे आज भी वैसे ही जुड़ती है। ऐसे में कागज और साइार संसार दोनों ही रूपों में उनकी उपलधता को बढ़ाना  और आसान बनाना जरूरी हो गया है।

1990 में गठित प्रेमचंद साहित्य संस्थान कथा सम्राट की रिहाईश रहे भवन से 1996 से संचालित हो रहा है। यह भवन प्रेमचंद पार्क के बीचोंबीच है। 137 वीं जयंती पर प्रेमचंद के लिखे नाटकों के मंचन के अलावा यहां कई आयोजन होने हैं। लेकिन इस मौके पर संस्थान की सासे बड़ी कोशिश तीन हजार किताबों तक सिमट गई अपनी लाइा्रेरी को सम्भालने और डिजिटाइजेशन के जरिये ई-लाइा्रेरी का नया आधार खड़ा करने की है। संस्थान के सचिव मनोज सिंह कहते हैं, इंटरनेट पर हिन्दी के पाठक लगातार बढ़ रहे हैं। लेकिन प्रेमचंद से जुड़ा सारा कुछ अभी भी एक जगह कहीं उपलध नहीं है। सैकड़ों एप और वेासाइटों पर प्रेमचंद की कहानियां हैं।

संस्थान की वेासाइट में यह सा एक जगह मुहैया कराया जायेगा। यहां जर्रे-जर्रे में बसे हैं प्रेमचंद एक लमही वाराणसी में है जहां 31 जुलाई 1880 को प्रेमचंद का जन्म हुआ। लेकिन साहित्य प्रेमियों की नजर  में गोरखपुर भी लमही जैसा ही है जहां कथा सम्राट ने अपनी जिंदगी के नौ साल गुजारे। यहां जर्रे-जर्रे में प्रेमचंद बसते हैं।

उनकी कहानियों, उपन्यासों को पढऩे के बाद इन जगहों पर आपको कहीं मेले में खिलौने की जगह चिमटे के लिए मोलभाव करता नन्हा हामिद नार आ जायेगा तो कहीं गृहस्थी को पटरी पर लाने के लिए खेतों में दिन-रात जद्दोजहद करता होरी। दीक्षा विद्यालय में प्रथम सहायक अध्यापक के रूप में तैनाती के दौरान 19 अगस्त 1916 से 16 फरवरी 1921 तक प्रेमचंद जिस भवन में रहे वहां उनकी स्मृतियों को आज भी बड़े प्यार से संजो कर रखा गया है।

यह बाबत और है कि अभी भी हमने अपनी इस धरोहर के लिए उतना कुछ नहीं किया जितना माक्सिम गोर्की, टालस्टाय जैसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों के लिए उनके देशों में किया गया लेकिन फिर भी गोरखपुर भाग्यशाली है कि उसने अपनी विरासत को सम्भाल कर रखा है।स्वर्गीय वीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में प्रेमचंद पार्क की स्थापना हुई।

लेकिन उनके भवन को लोगों के लिए खोलने का काम 1996 में ही हो सका। प्रसिद्ध साहित्यकार परमानंद श्रीवास्तव , सदानंद शाही और राकेश मल्ल सहित शहर के कुछ साहित्य प्रेमियों ने मिलकर इसे एक ग्रंथालय  का स्वरूप दिया। लेकिन भवन का आधा हिस्सा आ भी गोरखपुर विकास प्राधिकरण के पास है जो रखरखाव के अभाव में बुरी तरह जर्जर हो रहा है।

जीडीए की सम्पत्ति के रूप में बंद पड़े उस हिस्से और प्रेमचंद साहित्य संस्थान के बीच में पडऩे वाला पुराना कुंआ पट चुका है। लाइब्रेरी  में आने वाले लोग अपने हीरो के आवास के उस हिस्से को खंडहर में तदील होता देखकर उदास होते हैं लेकिन वहां तक जा नहीं पाते। प्रेमचंद पार्क की दीवारों पर उनकी कहानियों के पात्र भित्तिचित्रों में मौजूद हैं तो ओपेन थियेटर उन चरित्रों को आज भी जीवंत कर रहा है।

गोरखपुर में प्रेमचंद नौ वर्ष रहे= पहली बार 12 साल की उम्र में 1892 में आये = उनके पिता अजायालाल यहां डाक विभाग में तैनात थे= रावत पाठशाला और मिशन स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की= यहीं पर उनमें साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा हुआ= लेखन के प्रति उनका रुझान यहीं से शुरू हुआ= दूसरी बार नौकरी के सिलसिले में गोरखपुर आये= 19 अगस्त 1916 से 21 फरवरी 1921 तक यहां रहे= 1921 में महात्मा गांधी का भाषण सुनकर सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया= पूर्णकालिक लेखक के रूप में स्वाधीनता संग्राम के सेनानी बन गये= जनसहयोग से यहां 1960 में स्थापित उनकी मूर्ति का अनावरण उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने किया