लम्हे

0
236
Naseem saketi

सैनिक शासन से मौत की सज़ा सुनते ही 25 वर्षीय दलबीर सिंह के पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई, उसका रोम-रोम कांप-उठा, उसकी खुली आंखें धीरे-धीरे स्वत: बंद होने लगी, आंखों के बन्द होने के बाद उसे कुछ सुकून का एहसास होने लगा क्योंकि अब उसकी आंखों के सामने उसका अपना देश, उसका गांव, उसके तालाब के किनारे ताड़ के पेड़ के पास उसका घर, उसकी नई-नवेली 20 वर्षीया दूल्हन परमजीत कौर के चित्र नजर आ रहे थे…सुहागरात की सुबह को ही तो उसे जासूसी के जुर्म में कैद करके सीमा-पार जेल में डाल दिया गया था। जब वह अपने बचपन के जिगरी दोस्त अब्दुल से मिलने गया था, बंटवारे के बाद दलबीर सिंह के गांव तथा अब्दुल के गांव को सीमा-रेखा ने दो देशों में बांट जरूर दिया था लेकिन उनके दिलों को बांटने में वह नाकाम रही क्योंकि उनके दिलों में कोई सरहद नहीं थीं, वहां मोहब्बत
बस्ती थी।
अब्दुल ने पाकिस्तानी सैनिकों को समझाने का बहुत प्रयास किया। ‘दलबीर सिंह मेरा बचपन का यार है, वह मुझसे मिलने आया था, यह जासूस नहीं है, बड़ा नेक इंसान है, मैं आप लोगों से हाथ जोड़ता हूं, आपके पैरों में अपनी टोपी रखता हूं, मेहरबानी करके उसे छोड़ दीजिए, मेरा जमीर मुझे धिक्कारेगा, मेरे मुंह पर थूकेगा, मुझे सुकून से जीने नहीं देगा, अभी कल ही इसकी शादी हुई है, पलक-पांवड़े बिछाये इस की बीवी इसकी बाट जोह रही होगी, उसके दिल पर क्या गुजरेगी, वह जीते जी मर जायेगी, दलवीर सिंह के मां-बाप तो पहले ही अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं, उसकी बीवी अकेले कैसे रहेगी’? लेकिन इन्सानियत से कोसों दूर पाक-सैनिकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा, शायद सैनिक शासन में तानाशाह की तरह सैनिकों के दिल भी पत्थर के हो जाते हैं। दलबीर सिंह पर जासूसी का केस चलाया गया, पहले तो उसने खुद अपने बचाव में अपनी सच्चाई से भरपूर पुर-जोर आवाज़ बुलन्द करके अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश किया लेकिन मिलेट्री कोर्ट के आगे उसकी आवाज़ नक्कार-खाने में तूती की आवाज बनकर रह गयी, अब्दुल ने भी इसकी पैरवी में एड़ी-चोटी एक कर दिया लेकिन बेसूद क्योंकि सैनिक अदालत ने वकीलों की तर्क-पूर्ण तथा सार्थक दलीलों को कमजोर बताकर पर्याप्त सबूतों के अभाव का सहारा लेते हुये उसे मौत का फरमान सुना दिया, लेकिन शायद उसकी जीवन-रेखा अभी मिटी नहीं थीं, बल्कि गहरी होकर मौत को चुनौती देती हुयी अपने भाग्य पर मुस्कुरा रही थी क्योंकि उसके वज़ूद को मिटा देने वाले उस नापाक, खौफनाक फरमान के सुनाने की सुबह को सैनिक शासन का आग उगलता सूरज अस्ताचल की ओर चला गया और एक बार फिर पाकिस्तान में लोक-तन्त्र का खुशनुमा सूरज नई सुबह नई किरन के साथ नमूदार हो गया, लोक-तन्त्र की नई सुबह दलबीर सिंह के लिए जीवन-दायिनी सिद्ध हुई। दलबीर सिंह की अपील पर राष्ट्राध्यक्ष ने फांसी की क्रूर सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। इस आशापूर्ण बदलाव को सुनते ही दलबीर सिंह की आंखों में एक नई उम्मीद की चमक आ गयी, वतन की सोंधी मिट्टी की सुगन्ध उसके नथुनों में भर गई भले ही मृग-तृष्णा के रूप में, उसकी शरीर की नसों में प्रवाहित रक्त ने खुशियां इसलिए दौडऩे लगी थीं कि अब वह सैनिक शासन द्वारा दिये गये फांसी के शैतानी पंजों की गिरफ्त से आजाद कर दिया गया था, भले ही अब भी जेल की छोटी सी तंग कोठरी में उसे जीवन-संघर्ष से दो-चार होना पड़ेगा, मौत और जिन्दगी का चेहरा कितना बदसूरत अथवा खूबसूरत होता है दलबीर सिंह को इसका शिद्दत से एहसास जरूर हुआ होगा।
फांसी के फंदे से उसे राहत जरूर मिल गयी थी। जहां पल भर की देर में ही जिन्दगी का वजूद खत्म हो जाता है लेकिन जेल में भी जिन्दगी जिन्दा-लाश बनकर तिल-तिल मरती है, जैसा की 40 वर्षों से दलबीर सिंह जेल की छोटी-सी तंग-कोठरी में असहनीय घुटन भरी जिन्दगी जी रहा था, अब वह 65 वर्ष का सफेद दाढ़ी-मोछों वाला एक कृष-काय व्यक्ति था, वह अपने दोनों हाथों की हथेलियों को गालों पर रखकर कुहनी को पैरों पर टिकाये माजी के धुंधुलकों में झांककर यादों के चिरागों की रोशनी में जिन्दगी के पल-पल गुजारें लमहों को देख तथा महसूस कर रहा था जिन में कुछ लमहे शहद की तरह मीठे तथा कुछ निमकौड़ी की तरह कड़़ुवे थे।
जेल की तंग कोठरी के लोहे की दरवाजे के खुलने की आवाज से उसे लगा जैसे ठहरे हुये लमहों के पानी में किसी ने पत्थर फेंक दिया हो जिस से उसके मीठे तथा कड़ुवे लमहे बिखर गये, आंखों ने देखा सामने डिप्टी जेलर जावेद इक़बाल जेल के कर्मचारियों के साथ खड़ें थे, सभी के खिले हुये चेहरों से लगा कि दलबीर सिंह को जो खुशखबरी देने वह जा रह हैं उससे वे भी खुश हैं, वजह आज भी दहशत-गर्दी के शोलों को हवा देने वालों के अलावा हर पाकिस्तानी के दिल में एक छोटा-सा हिन्दुस्तान बसता है क्योंकि उनकी जड़ें तो हिन्दुस्तान में ही है, दुश्मनी की बातें तो वहां के कुछ स्वार्थी पेशेवर राजनीतिज्ञ की मिली भगत से धर्म के तथाकथित अलमबरदार इन्सानियत के दुश्मन दहशत-गर्द करते है जो गरीब-बेरोजग़ार युवकों को ‘जेहाद’ की गलत व्याख्या से उनका ब्रेन-वॉश करके उनके दिलो-दिमाग को नफरत के शोलों से भरकर आतंकवाद का उद्योग चलाते हैं, युवकों को बेशुमार दौलत देकर उनको आतंक-वाद की ट्रेनिंग की भट्टी में तपाकर खूंखार आतंकवादी बनाते हैं और मुम्बई जैसी घृणित, जलील तथा इंसानियत को शर्मसार करने वाली वारदातें कराते हैं और हम हैं कि अमन व शांति की बातें करते है और दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं क्योंकि हम मानते है कि दो मुलकों की समस्याओं का हल ‘युद्ध’ कभी नहीं हो सकता।
दलबीर सिंह के व्यवहार से जेलर, डिप्टी जेलर तथा जेल के सभी कर्मचारी, काफी प्रभावित थे, अन्य कैदियों की भांति उसने कोई ऐसी हरकत जाने-अनजाने में कभी नहीं किया जिससे उस पर उंगुली उठायी जा सके, एक अच्छे इंसान की तरह वह शालीन तथा शान्तमय जीवन जेल में बिता रहा था। यहीं कारण था कि जेल के कर्मचारी उसकी तारीफों के पुल बांधा करते थें, मांगने पर उसके बारे में अच्छी से अच्छी रिपोर्ट देते थे। यकायक डिप्टी जेलर को अपने सामने पाकर वह ठगा-सा अवाक, हक्का-बक्का रह गया, उसके हाथ बड़े अदब से सलाम के लिये उठ गये। आदाब, साहब…, आदाब…दलबीरा मुबारक हो, मैं तुम्हारी रिहाई का परवाना लाया हूं। क्या? तो मैं अपने वतन जा सकूंगा? उसके मुंह से बे-साख्ता निकला, उसके चेहरे पर उभरी खुशियां देखने लायक थीं, उसकी आंखों में अजीब चमक आ गयी थीं। बिल्कुल इस में अब कहां शक की गुंजाइश रही, डिप्टी जेलर के भी खुशियों में सराबोर शब्द थे, दलबीर सिंह को अपनी रिहाई के परवाना की बात सुनकर सबसे पहले अपने वतन की याद आयी इससे मानसिकता का पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति अपने वतन से दूर अच्छे अथवा बुरे हालात में भले ही रहे मानसिक रूप से अपने वतन से उसका जुड़ाव स्वाभाविक तथा शाश्वत है। जेल की ऊची-ऊची चहार दीवारियों के बाहर आने की खबर से कैदी का रोम-रोम खुषियों से बोझिल हो उठता है, दिल बल्लियों उछलता है, मन-मयूर नाच उठता है, दलबीर के साथ भी ये सब हो रहा था। जेलर साहब, मैं ख्वाब तो नहीं देख रहा हुं क्योंकि मैं तो आजीवन कारा-वास का कैदी हूं, यह सब हुआ कैसे?