कविता: अपनेपन का मतवाला- अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैं 

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अपनेपन का मतवाला

 

अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैं

खो न सका

चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका

 

देखा जग ने टोपी बदली

तो मन बदला, महिमा बदली

पर ध्वजा बदलने से न यहाँ

मन-मंदिर की प्रतिमा बदली

 

मेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोई

धो न सका

चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका

 

हड़ताल, जुलूस, सभा, भाषण

चल दिए तमाशे बन-बनके

पलकों की शीतल छाया में

मैं पुन: चला मन का बन के

 

जो चाहा करता चला सदा प्रस्तावों को मैं

ढो न सका

चाहे जिस दल में मैं जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका

 

दीवारों के प्रस्तावक थे

पर दीवारों से घिरते थे

व्यापारी की जंजीरों से

आजाद बने वे फिरते थे

 

ऐसों से घिरा जनम भर मैं सुखशय्या पर भी

सो न सका

चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका

– गोपाल सिंह नेपाली

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