गज़ल : गमे-इश्क तो अपना रफीक रहा, कोई और बला से रहा-न-रहा

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बहादुर शाह जफर

नहीं इश्क में इसका तो रंज हमें,
किशिकेब-ओ-करार जरा न रहा
गमे-इश्क तो अपना रफीक रहा,
कोई और बला से रहा-न-रहा

दिया अपनी खुदी को जो हमने मिटा,
वह जो परदा-सा बीच में था न रहा
रहे परदे में अब न वो परदानशीं,
कोई दूसरा उसके सिवा न रहा

न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर,
रहे देखते औरों के ऐबो-हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र,
तो निगाह में कोई बुरा न रहा

हमें सागरे – बादा के देने में अब,
करे देर जो साकी तो हाय गजब
कि यह अहदे-निशात ये दौरे-तरब,
न रहेगा जहां में सदा न रहा

उसे चाहा था मैंने कि रोक रखूं,
मेरी जान भी जाए तो जाने न दूं
किए लाख फरेब करोड़ फसूं,
न रहा, न रहा, न रहा, न रहा

‘ज़फर’ आदमी उसको न जानिएगा,
हो वह कैसा ही साहबे, फहमो-ज़का
जिसे ऐश में यादे-खुदा न रही,
जिसे तैश में खौफे खुदा न रहा