मलेरिया दिवस 25 अप्रैल : मलेरिया से मुक्ति बड़ी चुनौती

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24 मार्च विश्व टीबी दिवस : भारत के माथे का बदनुमा दाग, चिंताजनक है रोगियों की संख्या
पूनम नेगी

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में हर साल मच्छरों के काटने से फैलने वाली बीमारियों में पिछले कुछ वर्षों से डेंगू और मलेरिया के अलावा मस्तिष्क ज्वर, चिकनगुनिया और फाइलेरिया ने भी कई राज्यों में पैर पसार लिए हैं। बरसात के साथ डेंगू के मच्छर भी अपना असर दिखाने लगते हैं। दिल्ली,उड़ीसा, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में यह बीमारी हर साल ही कहर बरपाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो मच्छरों की अब ऐसी प्रजातियां पैदा हो गई हैं जिन पर सामान्य कीटनाशकों का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा । उनमें उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गई है, इसलिए बाजार में बिकने वाली मच्छर-मार टिकिया या रसायनों का उन पर असर नहीं हो रहा। इस कारण इलाज मुश्किल होता जा रहा है और इन रोगों से मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि डेंगू और मलेरिया से संबंधित सही सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि वही जांच आंकड़ा बनती है जो सरकारी संस्थानों मे होती है। निजी पैथालाजी लैबों से आंकड़ें लेने और देने की प्रक्रिया को बढ़ावा न मिलने के कारण इससे पीड़ितों की सही संख्या का अनुमान नहीं हो पाता।

गौरतलब हो कि अमेरिका की ब्रंडेस यूनिवर्सिटी के डोनाल्ड शेपर्ड के अक्टूबर 2014 में जारी एक शोध पत्र के अनुसार भारत विश्व में सबसे अधिक डेंगू प्रभावित देशों मे शामिल है।  इसके मुताबिक 2012 में दक्षिण एशिया क्षेत्र में डेंगू के लगभग दो लाख नब्बे हजार मामले दर्ज हुए थे, जिसमें करीब 20 प्रतिशत भागीदारी भारत की थी। यह आंकड़े वाकई चिंता का विषय है। आंकड़ों के मुताबिक अब तक देश के विभिन्न राज्यों मे 13 हजार से अधिक लोग डेंगू कर चपेट मे आ चुके हैं। देश की खराब स्वास्थ्य सेवाओं और उस से भी खराब डॉक्टर-मरीज अनुपात को देखते हुए इस संख्या को जल्दी नीचे ले आना भी एक बड़ा काम है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिको के अनुसार देश को डेंगू रोधी टीका विकसित करने में अभी चार-पांच साल और लगेंगे।

जरा विचार कीजिए! मच्छरजनित बीमारी से भारत की अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 13000 करोड़ स्र्पये का नुकसान हो रहा है। जबकि दूसरी ओर पड़ोसी देश श्रीलंका है जो साउथ-ईस्ट एशिया में मालदीव के बाद मलेरिया मुक्त होने वाला दूसरा देश बन चुका है। गौरतलब हो कि बीसवीं सदी मे श्रीलंका सबसे ज्यादा मलेरिया प्रभावित देशों में शामिल था। सन 1970 और 80 के दशक में श्रीलंका में मलेरिया खूब फैला। इसके बाद 90 के दशक में यहां एंटी मलेरिया कैम्पेन चलाना शुरु किया गया। करीब 26 साल बाद नेताओं के विजन और जनता के साहसिक कदम यानी दोतरफा कोशिशों से आज वह देश मच्छरों के प्रकोप से पूरी तरह मुक्त  तथा इस रोग की रोकथाम मे सालाना होने वाले करोड़ों के खर्च और जनहानि बचाने में कामयाब भी। लगातार तीन साल तक मलेरिया का कोई केस सामने नहीं आने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साल 2012 में उसे मलेरिया मुक्त देश घोषित कर दिया है।  श्रीलंका के अलावा संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को, आर्मिनिया, तुर्कमेनिस्तान जैसे कई देश हैं जिन्होंने पिछले सात आठ सालों में मलेरिया से मुक्ति पा ली है। हाल ही में पूरे यूरोप क्षेत्र को भी मलेरिया मुक्त घोषित कर दिया गया है। यूरोप में 1995 में मलेरिया के 90 हजार 712 मामले सामने आए थे लेकिन दो दशक में यह शून्य हो गए। दूसरी ओर हमारा देश इस मामले में अभी भी लक्ष्य से काफी दूर है। हम आजादी के पहले और उसके बाद से लगातार मलेरिया और डेंगू की रोकथाम के लिये अभियान चला रहे हैं और कब तक चलाते रहेगें पता नही। सरकार के लक्ष्य के मुताबिक भारत को मलेरिया मुक्त होने में 2030 तक का वक्त लग जाएगा। डेंगू और चिकनगुनिया से मुक्ति कब मिलेगी, यह भी पता नहीं।

इस अभियान पर हुये खर्च और जनहानि का कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है लेकिन अब तक अरबों रूपये खर्च और हजारों जनहानि का अनुमान है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो हर सात में से एक भारतीय को मलेरिया का खतरा रहता है। जबकि डेंगू का प्रतिशत इससे कुछ कम है। देश में मलेरिया से होने वाली कुल मौतों में 90 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में होती है। जबकि डेंगू का प्रकोप शहरों मे अधिक रहता है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में हर साल एडीज मच्छरों से फैलने वाला डेंगू सैकड़ों जिंदगियां तबाह कर देता है। पिछले कुछ वर्षों से डेंगू ने कई राज्यों में पैर पसार लिए हैं, पर दिल्ली में यह बीमारी कहर बरपाती रही है। डेंगू के मच्छर बरसात के साथ अपना असर दिखाना शुरु कर देते हैं।

गौरतलब हो कि मलेरिया पर रोकथाम के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (एनएमसीपी) चलाने के साथ ही डीडीटी का छिड़काव शुरु किया था। इसके पांच साल बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुरोध पर वर्ष 1958 में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम (एनएमईपी) और आगे चलकर मोडिफ़ाइड प्लान ऑफ़ ऑपरेशन (एमपीओ) नाम से नई योजना शुरु की गयी। इसके कुछ समय बाद यूनिसेफ़ ने मलेरिया जैसे ख़तरनाक रोग के प्रति जनता का ध्यान केंद्रित करने के मकसद से 25 अप्रैल 2008 को विश्व मलेरिया दिवस मनाने की शुरुआत की। इस तरह  आजादी के बाद से देश में लगातार मलेरिया और डेंगू की रोकथाम के लिये अभियान चल रहे हैं। इस अभियान पर अब तक अरबों रुपये खर्च का अनुमान है। मगर अभी इस पर नियंत्रण दूर की कौड़ी लगता है।  डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो हर सात में से एक भारतीय को मलेरिया का खतरा रहता है, जबकि डेंगू का प्रतिशत इससे कुछ कम है। देश में मलेरिया से होने वाली कुल मौतों में 90 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में होती है जबकि डेंगू का प्रकोप शहरों मे अधिक रहता है।

विश्व की स्वास्थ्य समस्याओं में मलेरिया आज भी एक गम्भीर चुनौती बनी हुई है। यह  ऐसी जानलेवा बीमारी है, जो प्रतिवर्ष हजारों लोगों को अपना शिकार बना लेती है।  पिछले दो दशकों में मलेरिया उन्मूलन के वैश्विक कार्यक्रमों के बावजूद  इस जानलेवा बीमारी पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं पाया जा सका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि साल 2000 से अब तक यानी बीते डेढ़ दशक में मलेरिया से होने वाली मौतों में 25 फीसदी कमी आई है लेकिन इस उपलब्धि के बावजूद हकीकत यह है कि आज भी दुनिया में मलेरिया से हर साल तकनीबन छह लाख 60 हजार लोगों की मौत हो जाती है। चिन्ताजनक यह है कि इनमें भी ज्यादातर बच्चे होते हैं। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि दुनिया में हर साल मलेरिया के करीब 20 करोड़ नये केस सामने आते हैं। भारत में मलेरिया की स्थिति पर गौर किया जाए तो भारत की आजादी के बाद से अब तक हजारों लोग इस बीमारी की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं। मलेरिया एक भयानक बीमारी है।  स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय मच्छर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीडीसीपी) के तहत देश में प्रतिवर्ष करीब 15 लाख मलेरिया मरीजों की संख्या दर्ज की जाती है। मंत्रालय के अनुसार अत्यधिक वर्षा व बाढ़ से हुए जलभराव व अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाएं और रहन-सहन की मानव निर्मित अस्वास्थ्यकर आदतें इस बीमारी के संक्रमण को तेजी से बढ़ाती हैं। इस संक्रामक बीमारी से मुक्त रहने का सबसे बड़ा उपाय है जागरूरकता। श्रीलंका की भांति राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ समस्त जनसमाज की संकल्पित सहभागिता से ही हम मच्छर जनित इस आपदा से मुक्त हो पाएंगे।

                                                                                                                       

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