पुस्तक-समीक्षा: आरएसएस की अविराम एवं भाव यात्रा का ‘ध्येय पथ’

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जब भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जानने या समझने का प्रश्न आता है, तब वरिष्ठ प्रचारक यही कहते हैं- ‘संघ को समझना है, तो शाखा में आना होगा।’ अर्थात् शाखा आए बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। जो साहित्य लिखा भी गया था, वह संघ के विरोध में लिखा गया। किंतु, आज संघ के संबंध में सब प्रकार का साहित्य लिखा जा रहा है/उपलब्ध है। इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है- ‘ध्येय पथ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक।’ पुस्तक का संपादन लेखक एवं पत्रकारिता के आचार्य प्रो. संजय द्विवेदी ने किया है। पुस्तक में संघ के विराट स्वरूप को दिखाने का एक प्रयास संपादक ने किया है।

संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने संघ की दशक की यात्रा का निकट से अनुभव किया है, इसलिए उनके संपादन में इस यात्रा के लगभग सभी पड़ाव शामिल हो पाए हैं। प्रो. द्विवेदी के संपादकीय के शुरुआती पैराग्राफ में लिखा है- आरएसएस के बारे में बहुत से भ्रम हैं। आरएसएस की काम करने की प्रक्रिया ऐसी है कि वह काम तो करता है, प्रचार नहीं करता। इसलिए वह कही बातों का खंडन करने भी आगे नहीं आता है। ऐसा संगठन जो प्रचार में भरोसा नहीं करता और उसके कैडर को सतत प्रसिद्धि से दूर रहने का पाठ ही पढ़ाया गया है, वह अपनी अच्छाइयों को बताने के लिए आगे नहीं आता, न ही गलत छप रही बातों का खंडन करने का अभ्यासी है।

‘ध्येय पथ’ ऐसे ही अनेक प्रश्नों के उत्तर हमारे सामने प्रस्तुत करती है। पुस्तक के ‘स्वतंत्रता संग्राम एवं संघ’ अध्याय में वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बल्देवभाई शर्मा, डॉ. मनोज चतुर्वेदी और राजेन्द्र नाथ तिवारी के आलेखों में प्रमाण और संदर्भ सहित यह सिद्ध किया गया है कि संघ और उसके स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता आंदोलन में न केवल हिस्सा लिया, अपितु अपने स्तर पर भी ब्रिटिश सरकार का विरोध किया। ‘इतिहास विकास एवं भावयात्रा’ अध्याय में कुछ ग्यारह आलेख शामिल हैं, जिनमें प्रख्यात बुद्धिजीवी केएन गोविन्दाचार्य का लेख भी शामिल है। गोविन्दाचार्य का लेख और इस अध्याय में शामिल अन्य लेख संघ के इतिहास, उसके उद्देश्य, कार्यप्रणाली और उसके स्वरूप से परिचित कराने का कार्य करते हैं। इसके आगे के अध्याय में आरएसएस के ‘सामाजिक योगदान’ की चर्चा की गई है।

‘संगठनात्मक योगदान’ अध्याय में संघ के प्रचारक मुकुल कानिटकर का महत्वपूर्ण लेख शामिल है, जिसमें उन्होंने भारतीय शिक्षण मंडल का विस्तृत परिचय दिया है। ‘स्त्री शक्ति और संघ’ अध्याय में डॉ. प्रेरणा चतुर्वेदी और संगीता सचदेव ने अपने आलेखों में इस बात पर विस्तार से प्रकाश डाला है कि संघ किस विधि स्त्री शक्ति के मध्य कार्य कर रहा है। पुस्तक के आखिर में ‘संघ: एक परिचय, दृष्टि और दर्शन’ अध्याय को शामिल किया गया है। बारह अध्यायों में 36 आलेखों को समेटे ‘ध्येय पथ’ वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को समर्पित है। पुस्तक की कीमत है २५० रुपए। पुस्तक का प्रकाशन दिल्ली के ‘यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स’ ने किया है।

– लोकेन्द्र सिंह