मार्मिक कविता: मजबूर थी ‘वो’……..

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मजबूर थी वो ………


किसी ने वैश्या कहा उसे
तो किसी ने धंधेवाली
क्यूँ ज़हमत न की किसी ने-2
कि चलो जाने क्या थी हकीकत सारी?

एक रोज़ आँगन पे बैठे निहार रही थी वो खुदको
मानो जैसे समझा रही हो वो सबको
रातों के अंधेरों में मुझको अब डर लगता है-2
अब कौन आएगा अगला तन को मेरे नोचने
बस यह सवाल हरपल जहन में उठता है?

नफरत की निगाह से समाज ने जिसे देखा था अक्सर
दरअसल ज़िन्दगी में उसके घुपा था वक़्त का खंजर
यूँ ही खुद को सरे-ए-बाजार में न बेचा था उसने
कुछ दरिन्दे उठा लाए थे उसे खरीदकर

कहती थी वो मेरी खिड़की के सामने
रहता था कानून भगवान बनकर
असल में बिका हुआ था वो भी
इन कोठों के दाम देखकर

जिस्म खरीदा सबने,
कोई रूह न खरीद सका
रुलाया सबने,
पर कोई आंसू न पोंछ सका
नरक बनाया सबने,
पर स्वर्ग न दे सका
धंधा समझ तो कोसा सबने-2
बस ‘कुछ तो मज़बूरी भी होगी’
ये बात कोई न सोच सका

           (चारू खरे)