आरक्षण विधेयक के कानूनी परीक्षा में पास होने पर संदेह

आरक्षण विधेयक के कानूनी परीक्षा में पास होने पर संदेह

 लखनऊ : कानून के अधिकांश जानकारों ने आरक्षण विधेयक को राजनीतिक हथियार व असंवैधानिक बताया आर्थिक रूप से पिछड़े तबके को नौकरियों व शिक्षा में दस फीसदी आरक्षण देने के विधेयक को लेकर कानून के जानकारों की अलग-अलग राय है। वैसे अधिकांश विशेषज्ञों ने इसे राजनीतिक हथियार और असंवैधानिक बताते हुए कहा है कि इसे अदालत में चुनौती दिए जाने की संभावना है। जानकारों को इस विधेयक के कानूनी परीक्षा में पास होने पर संदेह है।

सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है मामला:कश्यप
जाने-माने संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने कहा कि इसके लिए संविधान संशोधन के लिए जो प्रक्रिया है वह पूरी होनी चाहिए। संसद के दोनों सदनों में स्पेशल मेजॉरिटी से यह बिल पास होना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन का प्रावधान है और उसके अंतर्गत जो प्रक्रिया है वह यह है कि दोनों सदनों में बहुमत के साथ और एक स्पेशल बहुमत के साथ विधेयक पारित होना चाहिए। दोनों सदनों की सदस्य संख्या का बहुमत और जो उपस्थित हों या मतदान में भाग लें उनके दो तिहाई बहुमत से पास होना चाहिए। कश्यप का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की जो गाइडलाइंस है उसके हिसाब से इस संशोधन को चुनौती दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस कहती हैं कि संविधान संशोधन में अगर बेसिक फीचर्स को वॉयलेट किया गया तो इसे निरस्त घोषित किया जा सकता है। इस हिसाब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है और सुप्रीम कोर्ट अपने हिसाब से निर्णय दे सकता है। उन्होंने कहा कि जहां तक राज्यों से बिल पास कराने का सवाल है तो वह बात इस विधेयक पर लागू नहीं होती।

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विधेयक चुनावी पैंतरा: दिवेदी
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राकेश दिवेदी ने इसे चुनावी पैंतरा बताते हुए कहा कि असल सवाल तो यह है कि आरक्षण के प्रावधान से रोजगार की समस्याएं किस हद तक सुलझेंगी। चुनाव सिर पर होने के कारण सरकार यह कदम उठा रही है,लेकिन असल सवाल है कि आरक्षण के प्रावधान से रोजगार की समस्याएं किस हद तक सुलझेंगी। उन्होंने कहा कि इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की समग्र सीमा 50 फीसदी तय कर दी थी, लेकिन इसे अकाट्य नियम के तौर पर नहीं लेना चाहिए कि किसी भी हालात में यह सीमा इससे आगे नहीं बढ़ सकती।

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विधेयक की राह में कानूनी अड़चनें: सिन्हा
वरिष्ठ वकील अजित सिन्हा ने कहा कि इस विधेयक को लेकर संविधान के अनुच्छेद 15 में संशोधन करना होगा। इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी इस विधेयक की राह में कानूनी अड़चन साबित हो सकता है। अदालत को इस बात का परीक्षण करना होगा कि इस 10 फीसदी की बढ़ोतरी की अनुमति दी जा सकती है कि नहीं और इसकी अनुमति देना तार्किक होगा या नहीं।

नाकामी मिली तो बनेगा राजनीतिक हथियार:धवन
जाने माने वकील सतीश धवन का कहना है कि कानूनी तौर पर यह विधेयक कई आधारों पर असंवैधानिक है। पहला आधार यह है कि इंदिरा साहनी मामले में फैसले के बाद आर्थिक रूप से पिछड़ा तबका आरक्षण का आधार नहीं हो सकता क्योंकि इसमें नौ जजों में से छह जजों ने एससी-एसटी को नौकरियों में तरक्की के लिए आरक्षण की अनुमति दी थी। शेष तीन का कहना था कि आरक्षण के लिए पैमाना सिर्फ आर्थिक ही होना चाहिए, एससी-एसटी और ओबीसी जैसा कोई मापदंड नहीं होना चाहिए। 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करने से आरक्षण की कुल सीमा बढ़कर 60 फीसदी हो जाएगी और इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। धवन ने कहा कि यदि यह विधेयक पारित होता है तो इसे अदालत में जरूर चुनौती मिलेगी। यदि इसे नाकामी मिली तो तो यह राजनीतिक हथियार बन जाएगा।

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सीमा का उल्लंघन नहीं कर सकती सरकार: तुलसी
देश के जाने-माने वकील, राज्यसभा सांसद और संविधान विशेषज्ञ केटीएस तुलसी ने इस विधेयक को चुनावी स्टंट बताया। उनका कहना है कि यह न तो संविधान के मुताबिक है और न ही कानून बनने लायक। संविधान की मौजूदा व्यवस्था में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। ऐसा करने से समाज में नाराजगी बढ़ेगी। केंद्र सरकार किसी भी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन नहीं कर सकती।

जल्दबाजी में कोई नतीजा न निकालें: जैन
लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ सीके जैन का कहना है कि सरकार के इस फैसले के कई पहलू हैं। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट और संविधान में पहले से तय प्रावधान के हिसाब से ही इसे किया जाएगा। अभी के समय में यह एक पॉलिटिकल विषय है। सरकार ने संविधान संशोधन के बारे में जो तर्क दिया है उसे समझने की जरूरत है। हमें जल्दबाजी में किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए।