गोरखपुर: बीटेक और एमटेक के छात्रों को नए-नए अविष्कार करते तो आपने कई बार देखा और सुना होगा। लेकिन, एक चित्रकार का इनोवेशन करते आप शायद पहली बार सुनेंगे। जी हां, जिले के एक चित्रकार अजय ने अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए खिलौनों से प्रेरणा लेकर एक अनोखी साइकिल बनाई है। देखने में तो ये आम साइकिल जैसी लगती है। लेकिन, चलती है स्कूटी की तरह। अजय की ये अनोखी साइकिल सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

पैडल और एक्‍सीलेटर दोंनों मौजूद

महराजगंज के मिठौरा बाजार के 24 साल के अजय कुमार ने गोरखपुर विश्वविद्यालय में चित्रकला सीखी। इसके बाद अपने रोजमर्रा के कामों को आसान बनाने के लिए अजय ने तकनीकी दुनिया में हस्तक्षेप करते हुए एक ऐसी साइकिल तैयार की है, जो है तो साइकिल लेकिन चलती है स्कूटर की तरह। यानी इसे चलाने के लिए पैडल नहीं मारना पड़ता। बस  स्कूटर की तरह एक्सीलेटर घुमाना पड़ता है। हालांकि पैडल का विकल्प भी साइकिल में खुला हुआ है।

धन के अभाव ने दिया आइडिया

चित्रकला से तकनीक की ओर रुझान के सवाल पर अजय का कहना है कि धनाभाव के चलते उनके पास स्कूटर या बाइक नहीं है। घर से विश्वविद्यालय की दूरी अधिक होने के कारण आने में काफी दिक्कत होती थी। ऐसे में अजय ने साइकिल को ही स्कूटर का रूप देने की ठान ली। इसके लिए बच्चों के स्वचालित खिलौनों की तकनीक का गंभीरता से अध्ययन किया और डीसी मोटर से एक महीने के प्रयास के बाद साइकिल को बैटरी वाला स्कूटर बना दिया। इस स्वचालित साइकिल में अजय ने नौ एएच और 12 वोल्ट की दो बैटरी लगाई। जिसे एक बार चार्ज करने के बाद 20 से 30 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से सात से आठ किलोमीटर तक चलाया जा सकता है।

पेंटिंग बेंच जुटाए पैसे

अजय ने यह साइकिल अपनी बनाई गयी पेंटिंग बेचकर तैयार की है और इसमें इसकी कुल लागत 11 हजार आई है। अजय की यह साइकिल आज पूरे विश्वविद्यालय में सबके आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। सभी इसकी एक राइड मारना चाहते हैं। अजय के साथियों का कहना है की बाजार में इस तरह की साईकिलें काफी महंगी आती हैं और वो इतनी कम्फर्टेबल भी नहीं होती हैं। लेकिन अजय की साइकिल की बात ही अलग है। क्‍योंकि ये ईको-फ्रेंडली भी है।

कैपेसिटी बढ़ाने पर फोकस

गोरखपुर विश्‍वविद्यालय के ललित कला एवं संगीत विभाग की रीडर डा. ऊषा सिंह कहती हैं कि अजय ने चित्रकला का स्‍टूडेंट होकर जिस तरह का अनोखा आविष्‍कार किया है, वो प्रशंसा के योग्‍य है। उन्‍होंने पर्यावरण को ध्‍यान में रखते हुए जो इनोवेशन सा‍इकिल के साथ किया है, उससे समय की बचत भी होगी और बगैर पेट्रोल और डीजल के कहीं भी आया-जाया जा सकेगा। अजय को इसमें और सुधार कर इसकी कैपिसिटी बढ़ाने का प्रयास भी करना चाहिए। ललित कला विभाग के डा. गौरी शंकर चौहान कहते हैं कि उन्‍हें तो पता ही नहीं था कि अजय ने इस तरह का आविष्‍कार किया है। उन्‍हें जब पता चला, तो उन्‍होंने उसकी साइकिल देखी। लेकिन, उन्‍हें बाद में पता चला कि अजय तो पहले से ही विभाग के बच्‍चों के साथ शहर में भी लोकप्रिय हो चुके हैं।

अजय ने इस साईकिल में और ज्यादा एक्सपेरिमेंट करने की प्रक्रिया जारी रखी है और खास बात ये है की उसे तकनीक का कोई ज्ञान नहीं है। लेकिन अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अजय ने खिलौनों से प्रेरणा लेकर वो कर डाला जिसे करने के लिए लाखों रूपये खर्च करके ज्ञान लेना होता है।