Human Rights Day: “जियो और जीने दो ” मूल अवधारणा है

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2007
Human Rights Day:
Human Rights Day: "जियो और जीने दो " मूल अवधारणा है

 

राहुल लाल
राहुल लाल

मानवाधिकार मनुष्य को बिना किसी भेदभाव के सम्मान के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित कराता है । आज मानवाधिकार की जो,परिष्कृत एवं विस्तारवादी अवधारणा हम देखते हैं उसके जड़ में “जियो और जीने दो ” की मूल अवधारणा शामिल है।समाज के हर व्यक्ति को जीने का अधिकार है,तो समाज के हर व्यक्ति का भी कर्तव्य है कि वह अन्य के जीवन में बाधक न बने।यह मानवाधिकार की मौलिक अवधारणा है।

मानव अधिकारों के लिए जारी संघर्ष , इन्सानी अधिकारों की पहचान और वजूद को अस्तित्व में लाने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्‍ट्रीय मानवाधिकार दिवस (यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स डे) मनाया जाता है। मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों-सितम को रोकने और अमानवीय कृत्यों के खिलाफ संघर्ष की आवाज को मुखर करने में इस दिवस की महत्वूपूर्ण भूमिका है ।

मानव अधिकार जो कि प्रकृति ने मानव को जन्म के समय उपहार स्वरूप प्रदान किये इन मानव अधिकारों को कभी-कभी मूलभूत अधिकार ,आधारभूत अधिकार , अन्तर्निहित अधिकार ,प्राकृतिक अधिकार और जन्मसिद्ध अधिकार भी कहा जाता है। ये अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए नितांत आवश्यक हैं क्योंकि ये मानव की गरिमा एवं स्वतंत्रता के अनुरूप है तथा शारीरिक ,मानसिक ,बौद्धिक ,नैतिक ,सामाजिक और भौतिक कल्याण के लिए आवश्यक हैं। इन अधिकारों की अनुपस्थिति में मानव कभी भी किसी प्रकार का विकास नहीं कर सकता।

मानवाधिकारों का सृजन भी समाज में होता है।सामान्यतया मानवाधिकार से तात्पर्य है लिंग,धर्म,जाति,संप्रदाय,देश,आर्थिक स्थिति जैसे भेदभाव मूलक विचारों को त्याग कर मानव को समुचित विकास,संरक्षण,तथा ससम्मान जीवन जीने का वह अधिकार प्रदान करना जो उसे जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाता है।हमारे संविधान में मौलिक अधिकारों एवं नीति निदेशक सिद्धांतों को इसी भावना को ध्यान में रखते हुए स्थान दिया गया है।

मानव अधिकार के संरक्षण के प्रमाण प्राचीन काल की बेबिनिया विधि , असीरिया विधि और हित्ती विधि तथा भारत में वैदिक कालीन धर्म में पाए जाते हैं। मानव अधिकारों की जड़ें प्राचीन विचारकों के “प्राकृतिक विधि” और “प्राकृतिक अधिकार” की दार्शनिक अवधारणाओं में पाई जाती है।मानव अधिकारों के आधुनिक रूप में पृष्ठभूमि 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में आरंभ हुई थी। 18 वी शताब्दी में ज्ञानोदय का समय प्रारम्भ हुआ जिसने मानव के भीतर विश्वास व पारंगतता की भावना को और अधिक मजबूत कर दिया तथा इंग्लिश दर्शन शास्त्रियों जैसे कि मान्टेस्क्यू , वाल्टेयर और रूसो तथा जॉन लॉक ने व्यक्तियों के जीने ,स्वतंत्रता तथा संपत्ति के अधिकारों पर जोरों से चर्चा करनी शुरू कर दी थी।
ऐतिहासिक रूप से मानव अधिकार के संघर्ष का प्रमाण 15 जून 1215 में ब्रिटेन के सम्राट जोन द्वारा अपनी समिति को कतिमय मानव अधिकारों की मान्यता देने वाले घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर से मिलता है जो विश्व में मैग्ना कार्टा के नाम से प्रसिद्ध है।

1689 में ब्रिटेन में हुई क्रांति ने मानवाधिकार की अवधारणा का विस्तार दिया।इस क्रांति में “बिल ऑफ राइट्स” के द्वारा व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रताओं को मान्यता दी ग ई,जिनका अब तक हनन किया जा रहा था।
इसके बाद 1776 की अमेरिकी क्रांति,जिसमें अमेरिका ब्रिटेन से मुक्त हुआ तथा 1789 की फ्रांस की क्रांति जिसका मुख्य नारा था – स्वतंत्रता,समता तथा बंधुत्व ने आधुनिक मानवाधिकारों को विकसित होने के लिए आधार भूमि तैयार की।

10 दिसंबर 1948 को महासभा ने एक प्रस्ताव पारित करके “मानव अधिकारों” की विश्व घोषणा को अंगीकार किया। इस दिन को अन्तराष्ट्रीय मानव अधिकार के रूप में सारे विश्व में मनाया जाता है ।यह भी एक संयोग है कि संयुक्त राष्ट्र में जब मानवाधिकारों पर चर्चा हो रही थी उसी समय भारतीय संविधान का प्रणयन हो रहा था।हमारे संविधान निर्माता इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ थे और अपने देश के नागरिकों के लिए ऐसी ही व्यवस्था के लिए प्रयत्नशील थे।
परिणामस्वरूप भारतीय संविधान में मानवाधिकारों को उच्च स्थान देते हुए उसे मौलिक अधिकारों के खंड में न केवल शामिल किया गया बल्कि इसकी रक्षा की जिम्मेदारी न्यायपालिका को सौप कर इसे गारंटीकृत भी किया गया।

मानव अधिकार का सरंक्षण मूल भारत में वैदिक काल के धर्म में पाया जाता है . “सर्वे भवन्तु सुखिन , सर्वे सन्तु निरामया ” इसका अर्थ भारतीय जीवन का प्रमुख दर्शन है तथा इसकी प्राप्ति ही मनुष्य का चरम लक्ष्य है। भर्तृहरि ,वात्सायन कौटिल्य के ग्रंथों में भी मानव अधिकार को मनुष्य का स्वाभाविक गुण बताया गया है।गीता में भी मानव अधिकार का उल्लेख है “ कर्में वाधिका रस्ते ” धर्म प्राचीन भारत का सर्वोत्तम क़ानून है ये क़ानून नैतिकता , न्याय और सत्यनिष्ठा का पाठ पढ़ाता है।

धर्म का अर्थ है रक्षा करना, पोषण करना तथा कर्तव्यों का निर्वाह करना। मनु स्मृति , नीति वचन , अर्थशास्त्र आदि सभी ग्रंथों में मानव अधिकारों की चर्चा विभिन्न प्रसंगों में देखने को मिलती है। अर्थवेद में कहा गया है कि जीवन का जुआ प्रत्येक व्यक्ति के कंधे पर समान रूप से रखा जाता है।अतः प्रत्येक व्यक्ति अपने नैसर्गिक , आधारभूत अधिकार की सहायता से अपनी खुशियों को पाने का प्रयास करता है। भारत के विभिन्न संतों ने मानव अधिकार के विकास की दिशा में प्रयास किये।बुद्ध, महावीर ,कबीर ,गुरुनानक आदि के सन्देश भी हमें मानवीय मूल्यों की रक्षा के दिए हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार घोषणा पत्र पर भारत ने 1948 में हस्ताक्षर किया था और 1950 से महासभा ने सभी देशों को इसकी शुरुआत के लिए आमंत्रित किया था। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए तय किया।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,17,19,20,21,23,24,25-28 और 29-30 इत्यादि मानवाधिकारों का जबरदस्त संरक्षण करते हैं।इतना ही नहीं संविधान में अनुच्छेद 32एवं 226 के संवैधानिक उपचारों द्वारा अधिकारों की रक्षा करते हैं।केन्द्र सरकार द्वारा इन अधिकारों के संरक्षण तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित किए जाने वाले मानवाधिकार संबंधी अभिसमयों,प्रसंविदाओं के सम्यक पालन हेतु,तथा संबंधित उत्तरदायित्वों के सम्यक निर्वहन हेतु 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया है।

इस आयोग का गठन मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अंतर्गत किया गया।इसके अंतर्गत सभी राज्यों को मानवाधिकार आयोग के गठन का भी निर्देश दिया गया है।प्राय: देखा गया है कि हमारे भारतीय समाज में मानवाधिकारों का सर्वाधिक हनन निर्धन गरीब व्यक्तियों तथा महिलाओं व बच्चों का होता है।बाल श्रमिकों का नियोजन,बंधुआ मजदूर,आदिवासियों का शोषण,बड़े बाँध,जलाशयों,विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में बड़ी संख्या में स्थानीय निवासियों का विस्थापन,जंगल और जमीन पर जन सामन्य के अधिकारों की अस्वीकृति आदि मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है।इस प्रकार के प्रकरणों में आए दिन नागरिक अधिकार संबंधी संगठनों द्वारा आवाज उठायी जाती है।यद्यपि इस संदर्भ में भारतीय न्यायपालिका एवं सरकारों द्वारा उठाए गए कई कदम अत्यंत महत्वपूर्ण भी हैं।

मानव अधिकारों की वैश्विक सार्वजनिक घोषणा के पीछे कोई बाध्यकारी कानूनी शक्ति नहीं है,फिर भी यह घोषणा स्पष्ट तथा निश्चित रूप से राज्यों के सम्मुख एक नैतिक आदर्श प्रस्तुत करती है।इसने अवश्य ही विश्व के अनेकों संविधानों तथा अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को प्रभावित किया है,जो व्यक्ति के गरिमामय मानवीय जीवन तथा सर्वांगीण चतुर्दिक विकास के लिए अपरिहार्य हैं।अब समय आ गया है कि विश्व सरकारें मानवाधिकार संरक्षण हेतु अपनी कथनी – करनी एक करके दृढ़संकल्पित होकर कार्य करे।

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