इलाहाबाद: हाईकोर्ट ने लोक सेवा आयोग को राजकीय माध्यमिक विद्यालयों के सहायक अध्यापकों की भर्ती में पी जी डी सी ए डिग्रीधारक बी एड अभ्यर्थियों को शामिल होने की अनुमति देने का निर्देश बुधवार को दिया है। कोर्ट ने याचिका पर जवाब मांगते हुए जुलाई में सुनवाई हेतु पेश करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति जे जे मुनीर ने शाहजहांपुर के नरेंद्र कुमार  और कई अन्य की याचिकाओं पर दिया है। याचिका पर अधिवक्ता घनश्याम मौर्या और गुलाब सिंह ने बहस की। याची का कहना है कि वह 60 फीसदी अंक से स्नातक है, बी एड के साथ पी जी डी सी ए डिग्री धारक है। 14 जून 2018 फार्म फ़ीस जमा करने की अंतिम तारीख है। आयोग उन्हें योग्य होने के बावजूद परीक्षा में बैठने की अनुमति नही दे रहा है। इस भर्ती में 775 महिला और 898 पुरुष सहायक अध्यापकों के पद शामिल हैं। परीक्षा 29 जुलाई को होनी है।कोर्ट ने याचियों को फ़ीस जमा कर फार्म भरने की अनुमति देने का निर्देश दिया है।

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घर से भागी लड़की की उम्र जाँच का निर्देश

इलाहाबाद: हाईकोर्ट ने घर से भाग कर शादी करने वाली बांदा की लड़की कोमल की उम्र को डाक्टरों की टीम से जांच कराने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि स्त्री रोग विशेषज्ञ लेडी डाक्टर के साथ मुख्य चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में डाक्टरों का  बोर्ड याची की उम्र निर्धारण की जांच करे और रिपोर्ट कोर्ट में 19 जून को लड़की के साथ पेश की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति अजीत कुमार की खंडपीठ ने कोमल व अन्य की बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया है। कोर्ट ने लड़की के पिता को नोटिस जारी कर तलब किया है ।घर से भाग कर शादी करने वाली याची की उम्र को लेकर विवाद है।

धोखाधड़ी  व भष्ट्राचार  के आरोपी की जमानत खारिज 

 इलाहाबाद: हाईकोर्ट ने षड्यंत्र , धोखाधड़ी व् भ्रष्टाचार के आरोपी गोंडा के मदनमोहन शुक्ल की जमानत अर्जी  खारिज कर दी है। याची के खिलाफ 20 जनवरी 1997 कोतवाली गोन्डा में एफ आई आर दर्ज की गई है और 4 अप्रैल 2006 को इस मामले में चार्जशीट दाखिल हुई है।याची का कहना था कि 12 सालों में उसे कोई सम्मन नहीं मिला है किन्तु कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी से अपराध कारित हो रहा है ।अतः जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति अजित कुमार की खंडपीठ ने दिया है।

  सरकार व कोर्ट में टकराव जनहित के खिलाफ -सोशल रिफॉर्म 

इलाहाबाद: सेंटर फॉर कांस्टीट्यूशनल एन्ड सोशल रिफॉर्म के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता अमर नाथ त्रिपाठी ने कहा है कि न्यायधीशों की नियुक्ति को लेकर सरकार व न्यायपालिका के बीच टकराव लोकतंत्र के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जनता का ब्यूरोक्रेसी से विश्वास उठ गया है। सरकार वोट की राजनीति के चलते अपने एजेंडे पर कार्य करती है। केवल न्यायपालिका ही तीन संवैधानिक संस्थाओं में से ऐसी एक संस्था है, आज भी जिसपर जनविश्वास कायम है।जनता को कोर्ट से बहुत उम्मीद है। त्रिपाठी ने कहा है कि सरकार का लक्ष्य जनता को न्याय दिलाना है, उसे इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिये।विधि मंत्रालय पोस्ट ऑफिस नहीं है ,मंत्री का ऐसा बयान सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम सिस्टम लागू करने के फैसले के खिलाफ है।जो कोर्ट की अवमानना श्रेणी में आता है। त्रिपाठी ने कहा कि संविधान के लागू होने से 1950 से 1993 तक सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के न्यायधीशों की नियुक्ति में सरकार का अपरोक्ष दखल रहता था। 26 अक्टूबर 1990 को तीन जजों की पीठ ने एस पी गुप्ता केस के फैसले के खिलाफ 9 जजों की संवैधानिक पीठ गठित करने की सिफारिश की। 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम सिस्टंम को बाध्यकारी करार दिया और कहा कि कोलेजियम की संस्तुति माननी होगी।जजो की नियुक्ति में सरकार की कोई भूमिका नहीं होगी।1998 में कोलेजियम की खामियों को लेकर राष्ट्रपति के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट को पुनर्विचार का रिफरेन्स भेजा गया। इस फैसले के बाद की स्थिति  यह कि राष्ट्रपति कोलेजियम की राय मानने के लिए बाध्य है।इस सम्बन्ध में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की राय से कार्य नही करेगा।संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता कायम रखने व् कार्यपालिका व् विधायिका के हस्तक्षेप से दूर रखने के लिए संविधान में व्यवस्था की है।कोलेजियम की संस्तुत्ति की सरकार को जाच करने की छूट दी गयी है ताकि सही नियुक्तियां हो सके।और गलत लोग जज न बन सके। त्रिपाठी ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक आयोग रद्द होने के बाद मेमोरंडम ऑफ प्रोसिजर को अंतिम रूप न दिए जाने से कोलेजियम सिस्टंम प्रभावी है।उन्होंने कहा कि यदि सरकार सहमत नही है तो राष्ट्रपति के जरिये 9 जजो के फैसले पर पुनरविचार करने का रिफरेन्स भिजवाना चाहिए।या एक स्वतंत्र संस्था गठित कर जजो की नियुक्ति की व्यवस्था करनी चाहिए।जब तक ऐसा नही होता सरकार कोलेजियम की शिफारिश मानने के लिए बाध्य है।