Interview: यतींद्र मिश्र की बेबाक राय, आज का लेखक संपादक का मुखापेक्षी नहीं

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Interview: यतींद्र मिश्र की बेबाक राय, आज का लेखक संपादक का मुखापेक्षी नहीं
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यतींद्र मिश्र हिंदी साहित्य, संस्कृति और कला जगत का एक ऐसा नाम जिसमें विविधताओं की झलक है। कविताओं पर बात करिए तो कई युगों के कवि एक साथ सामने मौजूद से दिखते हैं। सुरों की बात हो तो सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर साक्षात प्रकट होकर अपनी जीवनगाथा सुनाती महसूस होती हैं, गिरिजा देवी की ठुमरी के आलाप भरती नजर आती हैं, सोनल मानसिंह के घुंघुरुओं की खनक सुनाई पड़ती है।

संगीत की बात निकले तो पंडित बिस्मिल्ला खां की शहनाई से निकले राग बरसने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे यतींद्र जी जैसा शहनाई मर्मज्ञ कोई और नहीं। फिल्म की बात उठे तो गुलजार साहब के गीत और उनका रचना संसार ऐसे उपस्थित होता है कि मानो वह सामने बैठकर ही ‘बीड़ी जलइले जिगर से पिया जिगर मा बड़ी आग है…’ लिख रहे हों। कुल मिलाकर यह कि यतींद्र मिश्र के रचना संसार का फलक इतना बहुआयामी है कि उन्हें किसी एक दायरे में समेटना मुश्किल है।

एक संवेदनशील कवि, एक विवेकशील संपादक, एक अद्भुत अनुवादक, एक गहरे संगीत अध्येता, एक उत्कृष्ट कला समीक्षक, एक समावेशी संस्कृति कर्मी, जन सरोकारों से जुड़े एक समाजसेवी और न जाने क्या-क्या…। इतनी सारी विशेषताओं से भरे यतींद्र जी वैसे तो राज परिवार से हैं और उनका लालन-पालन सुख सुविधाओं के बीच हुआ है लेकिन उनकी विनम्रता देख कोई यह कह नहीं सकता है कि राज प्रासाद वैभव उन्हें कभी लुभाता होगा। कम शब्दों में जब उनका परिचय जानिए तो कहते हैं, मैं मूलत: साहित्यिक व्यक्ति हूं।

विश्वविख्यात अयोध्या नगरी में 12 अप्रैल 1977 को जन्में यतीन्द्र मिश्र ने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिन्दी में परास्नातक की उपाधि हासिल की है। उनका शैक्षिक कैरियर कैसा रहा होगा, इसी से पता चलता है कि परास्नातक की उपाधि के साथ उन्हें स्वर्ण पदक भी मिला था। उन्होंने फैजाबाद के राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की। पढ़ाई के समय से ही वह साहित्य और संस्कृति के प्रति आकर्षित रहे हैं।

उनके कविता संग्रहों ड्योढ़ी पर आलाप, यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएं, के साथ ही विख्यात शहनाई वादक बिस्मिल्ला खां, सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, जाने माने गीतकार गुलजार पर लिखी किताबें साहित्य, संगीत और संस्कृति जगत में खासी चर्चित हैं। संगीत नाटक अकादमी की पत्रिका के संपादन का दायित्व भी अब उन पर आन पड़ा है। जिस पर वह कहते भी हैं कि प्रयाग शुक्ल जैसे सुविज्ञ कलापारखी के बाद उस पत्रिका का संपादन मेरे लिए एक बड़ी चुनौती है। रचनाकर्म की वजह से ही अयोध्या से लखनऊ, मुंबई और दिल्ली के बीच उनकी यायावरी बनी रहती है। वह जहां भी जाते हैं कविता, कला संस्कृति और संगीत साधकों से ही घिरे रहते हैं। वह दुनियादार भी हैं, पर इन्हीं के इर्द गिर्द।

अयोध्या में रहकर भी वह उस अयोध्या में ही रमे रहते हैं जो राजनीति से दूर है। यतींद्र मिश्र के रचना कर्म और उनके सरोकारों पर वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी ने उनसे लंबी बातचीत की है।

प्रस्तुत है बातचीत के अंश-

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