बाराबंकी: दीपावली वह त्योहार है, जिसमें हर व्यक्ति अपने घर लक्ष्मी आगमन की कामना करता है और उनकी राह तकता है। इसके लिए वह अपने घर की साफ – सफाई कर उसे सजाता है। माता लक्ष्मी का आवाहन करके उनसे अपने लिए सुख समृद्धि का वरदान माँगता है। मगर इस देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके प्रयासों से सैकड़ों घरों में माता लक्ष्मी की कृपा बरसती है लेकिन उनका घर सूना ही रहता है। हर बार की तरह इस बार भी यह लोग अपने घर में लक्ष्मी आगमन की तैयारी में जुटे हुए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार इनके आँगन में माता लक्ष्मी का आगमन हो या फिर यह लोग माता की राह तकते राह जायेंगे।

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इन कुम्‍हारों को है बड़ी आस

बाराबंकी में दीवाली के दिये, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्ति बनाते यह वह कुम्हार हैं, जो लोगों की साधना में साधन बन कर उनके घरों में माता लक्ष्मी के आगमन का जरिया बनते हैं। इनके प्रयासों से लोगों के घरों में सुख समृद्धि तो आ जाती है। मगर इनकी आँखें माता लक्ष्मी की राह ताकती रहती हैं। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि किस कारीगरी से यह लोग भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के रूप को मिट्टी पर उकेर देतें हैं। किस तरीके से गीले मिट्टी के ढेर से दिया का रूप दे देते हैं। यही वह दिया है जो माता लक्ष्मी के आगमन के लिए हर कोई अपने घरों को सजाता है। इसी स्वागत सजावट को देखकर माता अपनी कृपा घरों में बरसाती हैं।

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चाइनीज झालर से मायूस हैं कुम्‍हार

यह कारीगर दूसरों के घरों में तो लक्ष्मी का आगमन करवा देते हैं मगर इनका घर सूना ही रह जाता है। हर बार की तरह इस बार भी इन लोगों ने लक्ष्मी आगमन की तैयारी की है। अब माता इनके घर आती हैं कि नहीं यह भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। क्योंकि अब तक इनके घरों में सुख समृद्धि का आगमन हुआ ही नहीं। इन कुम्हारों की सुख समृद्धि में सबसे बड़ी बाधक बन गयी है चाइनीज झालरें। इन झालरों ने घर – घर तक इस कदर अपनी पहुँच बना ली है कि इनका दिया अब घरों में पहुंचना मात्र औपचारिकता रह गया है। अर्थात दियों को तो लोग नाम मात्र की खरीददारी कर अपनी इतिश्री कर लेते हैं।

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दिया कारीगरों ने बयां किया दर्द

बाराबंकी में दिया बनाते हुए कारीगर अयोध्या प्रसाद और राम नरेश बताते है कि वह हर साल दिए बनाते है मगर चाईनीज झालरों ने उनके इस कारोबार को खत्म कर दिया है। लोग दीयों की  खरीद तो करते है मगर सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए क्योंकि पूजा बगैर दियों की होती नही हैं। इस बार फिर यह दिए बना रहे है कि वह खूब बिकें। दिये जितने बिकेंगे, उन्हें उतना लाभं होगा और लक्ष्मी का आगमन और उनकीं कृपा उतनीं ज्यादा रहेगी। इस आशा के साथ यह अपने काम में लगे हुए हैं कि शायद इस बार उनके दिए ज्यादा बिक जाएं तो इनके घरों में भी इस बार सुख समृद्धि आ जाये।

कारीगर राम सुमिरन और फूलचन्द बताते है कि सरकार उनके बारे में सोंच नही रही अगर सरकार उनके बारे में कुछ विचार करे तो उनका घर भी खुशियों से भर जाएगा । यह लोग बताते है कि बड़ी मुश्किल से उन्हें चार से पाँच हज़ार रुपये ही मिल पाते है । इतने कम लाभ में उनका घर चलाना मुश्किल है जबकि मॅहगाई मुँह फाड़े खड़ी है । इनकी मुश्किल कम मुनाफे में ही खत्म नही हो जाती बल्कि इन्हें कई जगह चढ़ावा भी चढ़ाना पड़ता है । यह कारीगर बताते है कि दीवाली में दिया बेंचने के लिए जो दुकान लगानी पड़ती है उसके लिए उन्हे हज़ार हज़ार दो हज़ार का चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है । सरकार को चाहिए कि उन्हे दुकान लगाने के लिए कम से कम जगह की व्यवस्था करवा दे तो उन्हें इसके लिए चढ़ावा नही चढ़ाना पड़ेगा ।

इस काम में लगी महिला कारीगर दशरथा बताती है कि आज से पन्द्रह बीस साल पहले इस काम में उन्हें काफी फायदा होता था मगर आज इस काम में चाइना की घुसपैठ ने मुनाफे को काफी कम कर दिया है । आज लोग घरों में दिए से रौशनी करना अपने आप को गुजरे जमाने का और पिछड़ा समझते है । लोग समझते हैं कि चाईनीज झालर की रौशनी में उनका रुतबा बढ़ेगा । इस लिए आज घी और तेल के दिए जिनसे पर्यावरण भी शुद्ध होता है का ज़माना अब चला गया है । अब तो रोज़ी रोटी के भी लाले इस काम में पड़ गए हैं । काश इनके।दिए इस बार ज्यादा बिक जाएं बस यही अरमान है।

कुछ भी लेकिन जिस प्रकार की परिस्थितियां है उनसे ऐसा लगता है कि इस दीवाली भी इनके घरों में माता लक्ष्मी का आगमन नाम मात्र ही हो पायेगा । इस परिस्थिति को सुधारने के लिए सरकार की नही बल्कि स्वयं की जागरूकता ही काम आ सकती है । अब देखना होगा कि क्या इनकी आंखों को माता लक्ष्मी का दीदार हो पायेगा , यह एक यक्ष प्रश्न है।