आखिर किस चिड़िया का ना है आजादी, जो लोग आज भी हैं नाखुश व असंतुष्ट

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किशोर कुमार

लखनऊ: आजादी के इन सात दशकों में आज भी देश के कुछ तथाकथित स्वदेशी लोग इस बात से खासे नाखुश अथवा असंतुष्ट दिखाई पड़ते हैं कि इस देश में आजादी नाम की कोई चिडिय़ा कहीं उड़ती हुई उन्हें नहीं दिखलाई पड़ती। घूमने-फिरने, पहनने-ओढऩे से लेकर नामुराद स्वच्छता अभियान चलाकर सडक़ पर अथवा सार्वजनिक स्थल पर थूकने, कोने में खड़े होकर लघु शंका करने अथवा खुले में शौच करने तक की आज़ादी उन्हें अब छिनती नजर आती है।

बात कुछ पुरानी होकर भी कभी पुरानी न होने वाली है। उस वक्त दिल्ली में आज की तरह फैंसी व यात्रियों को देख-देखकर खुलने-बंद होने वाले दरवाजों वाली रंग-बिरंगी सरकारी बसें नहीं होती थीं। बेशक उनमें दरवाज़ा होता था पर वह प्राय: सुबह खुलता तो देर रात सोने के समय ही बंद होता था। बसें भी तब दिल्ली की सडक़ों पर आज़ाद परिंदे की भांति गुलाचें भरती अक्सर ड्राइवर तथा कंडक्टर की नापसंद के स्टॉप लांघते हुए ही आगे बढ़ती थीं।
ड्राइवर, कंडक्टर की मर्जी के स्टॉप पर रुकने या नाममर्जी के स्टाप पर न रुकने की यह उनकी अपनी आज़ादी थी। उन चलती बसों के युग में एक बार मेरी आंखों के सामने एक सज्जन के पिछले दरवाज़े से बस में चढ़ते और दूसरे के उतरते समय पान की पीकों का ऐसा मनोहारी आदान प्रदान हुआ कि मेरे कपड़े भी उन छीटों में नहाने से बच नहीं पाए।
भारतीय सडक़ें चाहे शाहजहां के नाम की हों अथवा बापू के नाम की, उन पर पैदल चलते समय अक्सर आगे वाले पर ज़्यादा फोकस करके रखना पड़ता है। पता नहीं कौन कब बिना पीछे वाले को देखे पान पराग, पान बहार या पान गुलकंद का तडक़ा उस पर उड़ेलकर उसका चोला बसंती रंग में रंग दे।
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