इंसानियत तो हिंदुस्तानियों में भी है और फिर अमरीकंस में भी, फिर अंतर क्या?

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सोनल कुमार

लखनऊ: आंखों में अश्रु थे और मन पे कोई संयम नहीं था। मैं नाराज थी और इन आंसुओं को छुपाने का कोई प्रयास नहीं था। ठान के बैठी थी कि एक साल होते ही मैं वापिस आऊंगी, दोस्तों से, मां-बाप से सबसे कह चुकी थी मैं वापिस आऊंगी। एयरपोर्ट के आटोमेटिक दरवाजे जब बंद हुए तो पीछे मुड़ के अपने मा-बाप को इस तरह देखा जैसे नाराज हूं, उनसे की उन्होंने क्यों नहीं रोका।

फ्लाइट में जाने से पहले के टाइम को थोड़ा टीवी देखके, थोड़ा फोन पे बात करके और थोड़ा घर का खाना खा के, पास में बैठे अपने पति से बिना बात किए गुजारा। जब फ्लाइट उड़ी तो अपने देश की धरती को आसमान से तब तक देखती रही जब तक बादलों ने भी साथ छोड़ दिया। भर ले ये उड़ान मैं, चल बैठी अमेरिका। भारत से 8000 मिले दूर, दिन रात के हिसाब से 13.5 घंटे दूर, अमेरिका।
बचपन से ही घर में, स्कूल में सीखा की भारत सबसे महान देश है। बड़े हुए तो ये एहसास मानो जैसे मन में जब था, किसी और देश में रहने की बात से ही विद्रोही जैसा लगने लगा था। एयरपोर्ट बदल के, प्लेन बदल के, सुन्न कानों से, सूजी आंखों से और थके हुए पैरों से अमेरिका में पहला कदम रखा। कागजों को हाथ में लिए हजार लोगों के साथ हम भी लाइन में खड़े हुए।
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