OMG! दुनिया में तेज़ी से बढ़ रही है डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या

0
385

स्वस्थ रहना जरूरी है और यह स्वास्थ्य सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक भी होना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से दुनिया में आज हर चौथे इनसान पर अपने जीवन काल में एक न एक बार मानसिक रोग का शिकार होने का खतरा जरूर होता है। इस रोग की सबसे बड़ी वजह है तनाव और निराशा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, मानसिक रोगों के शिकार बहुत से लोग इलाज करवाने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे लोग उनके बारे में गलत सोचने लगेंगे। इस कारण यह रोग बढ़ता है और आजीवन बना रहता है। एक समय ऐसा भी आता है कि इसका इलाज असंभव हो जाता है। डिप्रेशन बड़ी समस्या पूरी दुनिया में डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है।

इसके बावजूद भारत जैसे विकासशील देशों में मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा बात नहीं होती है और सरकारें भी इस तरफ कोई खास ध्यान नहीं देती हैं। भारतीय परिवारों में लोग प्राय: अपनी मानसिक परेशानियों को दूसरों के साथ नहीं बांटते हैं। छोटी-छोटी बातों पर डिप्रेशन में चले जाना स्वभाव बनता जा रहा है। छोटी उम्र से ही तनाव हावी होने लगता है और उम्र बढऩे के साथ-साथ यह मानसिक तनाव कई दूसरी बीमारियों की वजह भी बन जाता है। बावजूद इसके लोग मानसिक बीमारियों को गंभीरता से नहीं लेते।

ये भी पढ़ें…HEALTH TIPS: माइग्रेन से पीड़ित महिलाओं के लिए सुरक्षित है स्पेशल थेरेपी

  • दुनिया में करीब 45 करोड़ लोग मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं।
  • भारत में करीब 9 करोड़ लोग मानसिक परेशानी का सामना कर रहे हैं।
  • वर्ष 2005 से 2015 के बीच पूरी दुनिया में डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या 18.4 प्रतिशत बढ़ी है।
  • 2015 में भारत में 5 करोड़ लोग डिप्रेशन के मरीज थे।
  • दक्षिण एशियाई देशों में सबसे ज्यादा डिप्रेशन के मरीज भारत में ही हैं।
  • भारत में हर 20 में से एक व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार है।
  • दुनिया में होने वाली कुल मौतों में मानसिक रोगियों की आत्महत्या की हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत है।
  • 78 प्रतिशत आत्महत्याएं विकासशील या निर्धन देशों में ही होती हैं।
  • 2012 में पूरी दुनिया के मुकाबले भारत में आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले सामने आए थे।
  • 10 सबसे ज्यादा कमाई वाले देशों में तनाव और अवसाद की औसत उम्र 14.6 फीसदी है।
  • भारत के 9 फीसदी लोगों के जीवन में तनाव और निराशा की मात्रा बहुत ज्यादा है।
  • भारतीय लोगों में मेजर डिप्रेसिव एपिसोड्स सबसे ज्यादा 35.9 फीसदी है।
  • चीन में यह दर दुनिया में सबसे कम 12 फीसदी दर्ज की गई है। मेजर डिप्रेसिव एपिसोड्स लोगों की मनोस्थिति के बारे में जानकारी जुटा कर तैयार किए जाते हैं।
  • 2009 में हुए 1,27,151 खुदकुशी के मामलों में 8,469 ऐसे थे जो गंभीर मानसिक बीमारी से जुड़े थे।
  • पागलपन या मानसिक बीमारी लुधियाना में 39.2, कोच्चि में 34.2 और अमृतसर में 31.3 फीसदी खुदकुशी के मामलों की प्रमुख वजह रही है।

डिप्रेशन की दवा की बढ़ी मांग

एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016 में भारतीयों ने वर्ष 2015 के मुकाबले डिप्रेशन की ज्यादा दवाएं खाईं थी। वर्ष 2015 के मुकाबले 2016 में डॉक्टरों ने एंटी डिप्रेशन दवाओं के लिए 14 प्रतिशत ज्यादा पर्चे लिखे। वर्ष 2016 में एंटी डिप्रेशन दवाओं के 3 करोड़ 46 लाख पर्चे लिखे गए, जबकि वर्ष 2015 में यह संख्या 3 करोड़ 35 लाख थी।

महिलाएं ज्यादा शिकार

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ये परेशानी ज्यादा और जल्दी घर करती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार, 10 पुरुषों में एक जबकि 10 महिलाओं में हर 5 को डिप्रेशन की आशंका रहती है। ऐसा माना जाता है कि पुरुष अपना डिप्रेशन स्वीकार करने में संकोच करते हैं जबकि महिलाएं दबाव और शोषण के चलते जल्दी डिप्रेशन में आ जाती हैं।

ये भी पढ़ें…करें ये सरल घरेलू उपाय, इस सर्दी नहीं करेगा आर्थराइटिस आपको परेशान

10 प्रतिशत से अधिक भारतीय बुजुर्ग चपेट में

भारत में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्ध विषादग्रस्त हैं और इस आयु वर्ग के 40-50 प्रतिशत लोगों को अपने जीवन के संध्या काल में कभी न कभी किसी मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक की जरूरत पड़ती है। दूसरे देशों में भी बुजुर्ग मानसिक रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं। अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिका में वृद्धावस्था में होने वाली डिमेंशिया से करीब 2 करोड़ 90 लाख लोग प्रभावित हैं। एक आकलन के अनुसार, 2020 तक इनकी संख्या 5 करोड़ 50 लाख से भी अधिक हो सकती है।

दस लाख लोगों पर 3.5 डाक्टर

भारत में मानसिक रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों और सुविधाओं की भारी कमी है। भारत सरकार ने मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या और इलाज के पर्याप्त साधनों की कमी की वजह से 1982 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया था लेकिन मनोचिकित्सकों की कमी के कारण इसका बहुत फायदा नहीं हो सका। असल में भारत जैसे देशों में स्वास्थ्य बजट का महज एक फीसदी ही मानसिक रोगों के हिस्से में आता है जबकि विकसित देश इस पर बजट का 10 से लेकर 18 फीसदी हिस्सा खर्च करते हैं। भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर महज 3.5 मनोचिकित्सक हैं। ज्यादातर डॉक्टर शहरों में रहते हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मानसिक रोगों के इलाज की सुविधा बेहद खराब है। इसी तरह गांवों में ऐसे मनोरोगियों की संख्या काफी ज्यादा है जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। 2010 में चेन्नई के स्टैनली मेडिकल कॉलेज ने भारत में मनोचिकित्सकों की कमी पर एक रिपोर्ट जारी की इस रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में मनोचिकित्सकों की कमी 77 फीसदी है जबकि एक तिहाई से ज्यादा लोगों के लिए यह कमी 90 फीसदी तक है।

बढ़ रही है निराशा

भारत में निराशा में घिरे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञ तो यह चेतावनी भी दे रहे हैं कि अगर जल्दी ही कदम न उठाए गए तो निराश लोगों की औसत उम्र घट कर 30 साल तक पहुंच जाएगी। 2009 में बैंगलोर के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस की एक रिसर्च में अवसाद में घिरे भारतीयों की औसत आयु 31 साल बताई गई थी।

यूपी के 20 लाख युवा डिप्रेशन के शिकार

उत्तर प्रदेश स्टेट मेंटल हेल्थ सर्वे रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सैंपल सर्वे के आधार पर तैयार रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदेश के 20 लाख से ज्यादा कामकाजी युवाओं में जिंदगी जीने का हौसला घट गया है। यह संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि प्रदेश के 1.95 करोड़ लोग किसी न किसी तरह की मानसिक बीमारी का शिकार हैं। इस संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है। ओपीडी में आने वाले लगभग 95 फीसदी मरीज डिप्रेशन के किसी न किसी स्टेज में हैं। यह समस्या शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बढ़ रही है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में कुछ अधिक है। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, किसी न किसी तरह के नशे की प्रवृति के चलते डिप्रेशन के साथ ही मूड डिसआर्डर जैसी गम्भीर बीमारियां बढ़ा रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 0.93 फीसदी लोग ‘हाई सुसाइडल रिस्क’ में हैं यानी ये लोग आत्महत्या की प्रवत्ति के अत्यंत खतरे में हैं। केजीएमयू के एक शोध के अनुसार यूपी के कोई ९ लाख लोग बौद्धिक विकार से पीडि़त हैं।

क्या है कारण

  • उम्मीद के अनुरूप नौकरी या काम न मिलना।
  • काबिलियत के अनुसार वेतन न मिलना।
  • नौकरी में असुरक्षा की भावनाक विपरीत स्थिति में नशे की गिरफ्त में आ जाना।
  • वास्तविकता से दूर भागना।

मनोरोग विशेषज्ञों की कमी 

  • 130 करोड़ की जनसंख्या पर देश में 6000 विशेषज्ञक।
  • 30 करोड़ की जनसंख्या में अमेरिका में हैं 50000 विशेषज्ञक।
  • 75 प्रतिशत मनोरोगियों को मिल पाता है इलाज।
  • 20 लेक्चरर हैं मनोरोग पर एमबीबीएस पाठ्यक्रम में।
  • 01 महीने साइकियाट्री की ट्रेनिंग एमबीबीएस पाठ्यक्रम मेंक 15 दिन इंटर्नशिप एमबीबीएस की मनोरोग विभाग में।

ये भी पढ़ें…हर हेल्थ समस्या से लड़ने में है कारगर, अलसी में बहुत है फाइबर

2020 तक स्थिति हो जायेगी और भी खराब

  • डब्लू एच ओ के अनुसार वर्ष 2020 तक अवसाद विश्व भर में दूसरे सबसे बड़े रोगभार का कारण होगा। मानसिक स्वास्थ्य का वैश्विक भार विकसित और विकासशील देशों में इलाज की क्षमताओं से काफी परे होगा। इसलिये विकासशील देशों के सामने यह बहुत बड़ी चुनौती के रूप में है।
  • मानसिक स्वास्थ्य का संबंध बर्ताव से जुड़ा है और उसे शारीरिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता का मूल समझा जाता है।
  • शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य का निकट संबंध है और यह सिद्ध हो चुका है कि अवसाद के कारण हृदय और ब्लड सर्कु लेशन संबंधी रोग होते हैं।
  • मानसिक विकार व्यक्ति के स्वास्थ्य-संबंधी बर्तावों जैसे, समझदारी से भोजन करने, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, सुरक्षित यौन व्यवहार, नशा, आदि को प्रभावित करते हैं और इस तरह शारीरिक रोग के रिस्क को बढ़ाते हैं।
  • मानसिक अस्वस्थता के कारण सामाजिक समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं जैसे, बेरोजगार, बिखरे हुए परिवार, गरीबी, नशीले पदार्थों का दुर्व्यसन और संबंधित अपराध।क मानसिक अस्वस्थता शरीर की बीमारियों से लडऩे की क्षमता को प्रभावित करती है।

SHARE
Previous article‘द वॉयस..’ के मेजबान के रूप में वापसी करेंगे जय भानुशाली
Next articleवनस्थली विद्यापीठ को हाउस ऑफ लॉर्ड्स लंदन में सम्मानित किया जाएगा
प्रदीप कुमार पाल गत 09 वर्षों से पत्रकारिता जगत में कार्यरत हैं। इन्होने हिन्दी दैनिक ‘लोकमत’ से उप सम्पादक के रूप में अपना पत्रकारिता का कॅरियर प्रारम्भ किया था। इसके बाद हिन्दी दैनिक ‘हाईटेक न्यूज’, ‘अवधप्रान्त’ में वरिष्ठ उप सम्पादक के पद पर कार्यरत रहे हैं। साप्ताहिक हिन्दी अखबार एवं मासिक पत्रिका ‘ग्राम्य संदेश’ में प्रदीप ने मुख्य समाचार सम्पादक के पद पर कार्य किया है। अखबार के अलावा प्रदीप कई अन्य पाक्षिक एवं मासिक पत्रिकाओं में भी कार्यरत रहे हैं। एक वर्ष की रिपोर्टिंग के साथ-साथ प्रदीप को डेस्क के कार्य का अच्छा अनुभव है।