पुण्य की डुबकी लगाकर श्रद्धालु संग सैलानी भी प्रशस्त कर रहे मोक्ष का मार्ग

जहां यह सैलानी अखाड़ों के शाही स्नान में शामिल हो रहे हैं। इसके लिए बाकायदा पारम्परिक ढंग से नागा संन्यासियों की तरह भस्मी लगाकर चेहरे को ऊर्जावान किया है। इसी प्रकार भारी संख्या में विदेशी सैलानी आध्यात्मिकता को आत्मसात कर रहे हैं।

आशीष पाण्डेय,

कुंभ नगर: धर्म आध्यात्म और तप के लिए लगने वाले कुंभ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व पटल पर जिस प्रकार प्रचारित किया। उसका भी असर देखने को मिला।

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आज जहां हमारे देश में पाश्चात्य संस्कृति हावी हो रही है तो वहीं गंगा, यमुना एवं विलुप्त सरस्वति के पावन तट पर ऋषियों की तपोभूमि और तीर्थों के राजा प्रयागराज के कुंभ नगर में विदेशी शैलानी न केवल आकर्षित होकर आ रहे हैं बल्कि सोमवती मौनी अमावस्या पर अखाड़ों संग विधि विधान से शाही स्नान में भाग लिया और मोक्ष की कामना की। जिनके लिए सहज ही गोस्वामी तुलसीदास की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं।

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समुद्रपत्न्योर्जलसन्निपाते
पूतात्मनामत्र किलाभिषेकात्।
तत्त्वावबोधने विनापि भूयस्
तनुत्यजां नास्ति शरीरबन्ध:।।

अर्थात समुद्र की पत्नियों गंगा और यमुना के साथ अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान से बिना तत्वज्ञान के ही इस शरीर को जीवन मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। शायद भारतीय संस्कृति और आध्यात्म के साथ वेदों में ही ऐसी ऊर्जा है जो सात समुंदर पार से शैलानियों को कुंभ नगरी खींच लाई है। जहां यह सैलानी अखाड़ों के शाही स्नान में शामिल हो रहे हैं। इसके लिए बाकायदा पारम्परिक ढंग से नागा संन्यासियों की तरह भस्मी लगाकर चेहरे को ऊर्जावान किया है। इसी प्रकार भारी संख्या में विदेशी सैलानी आध्यात्मिकता को आत्मसात कर रहे हैं।

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