देहरादून। उत्तराखंड जिसे हम देवभूमि कहते हैं। जहां के पहाड़ हमारे जीवन की आधार नदियों के उद्गम स्थल हैं। उस उत्तराखंड या उत्तरांचल में त्रासदियों का इतिहास आज का नहीं है बल्कि करीब सवा दो सौ साल के उपलब्ध इतिहास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पहाड़ के लोग प्राकृतिक आपदाएं झेलने को अभिशप्त रहे हैं। एक आपदा आती है उसके बाद मदद के लिए सभी सोर्सेज को सक्रिय कर दिया जाता है। राज्य उससे पूरी तरह उबर भी नहीं पाता कि दूसरी आपदा की दस्तक हो जाती है। केंद्र सरकार पीडि़तों को मदद के लिए और पुनर्निर्माण के लिए बजट देती है। लेकिन राज्य के सारे संसाधन उस आपदा को झेलने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं। कहते हैं पहाड़ पर तीन ही बाबू होते हैं एक बाढ़ का, दूसरा सूखे का और तीसरा बाबू भूस्खलन के बाद जमींदोज हो चुके खेत, मकानों को दोबारा बसाने के लिए। इनका काम अनवरत चलता रहता है।

2013 में आई बाढ़ के बाद आज स्थिति ये है कि नदी के किनारे बसे शहर उन्हीं खतरों का सामना कर रहे हैं जिनका उन्होंने उस समय सामना किया था। बाढ़ में जान माल की इतनी हानि का कारण यह था कि केदारनाथ में हज़ारों यात्री फँस गए थे। इसके अलावा नदी के रास्ते में बने हुए घर व पुल बह गए थे और सड़कें टूट गई थीं। टिहरी के जड़धारी गाँव के रहने वाले व इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार प्राप्त विजय जड़धारी का कहना है कि आज भी पुनर्निर्माण का काम वैसे ही हो रहा है, मरम्मत का काम भी ठीक उसी तरह हो रहा है जैसे पहले था। अकेले केदार घाटी में नए निर्माण रोकने से कुछ नहीं होगा। अगर बाकी जगह अवैध निर्माण इसी तरह होते रहे तो ऐसे में मुझे लगता नहीं कि ये राज्य एक और त्रासदी के लिए तैयार है।

उत्तराखंड में हिमालय की पहाडिय़ों की जो श्रृंखला है उसकी बनावट ऐसी है कि उन्हें मजबूत नहीं कहा जा सकता। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि ये पहाडिय़ां लगातार ऊपर उठ रही हैं। इनके ऊपर उठने की प्रक्रिया जारी रहने से पूरा उत्तराखंड भूकंप प्रभावित जोन में आता है। इसके अलावा तेज़ बारिश के कारण भूस्खलन और नदियों में अचानक बाढ़ का खतरा भी बना रहता है। इसलिए जब भी इन आपदाओं से बचाव के लिए कुछ करने का समय मिलता है तो पहाड़ की नीति निर्धारण से जुड़े बाबू लोग ये मान लेते हैं कि ये प्राकृतिक आपदाएं हैं और पहाड़ पर रहने वाले इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। अभी हाल में गंगोत्री में झील बनने का मामला उठा लोग कोर्ट तक गए लेकिन मुख्य सचिव ने मानने से इनकार कर दिया। कहा ऐसा कुछ नहीं है यह सामान्य है। जबकि तबतक जांच के लिए भेजी गई टीम की रिपोर्ट भी नहीं आई थी।

दरअसल उत्तराखंड का निर्माण इस सोच के साथ हुआ था कि पहाड़ की संस्कृति और भूगोल अलग है इसलिए पहाड़ के लिए विकास का अलग मॉडल चाहिए। लेकिन अफसोस सत्ता तो बदलती रही लेकिन राज्य का मॉडल वही रहा जैसे मॉडल सारे देश में चल रहे हैं। यही सोच उत्तराखंड की सेहत को बिगाड़ रही है इसीलिए उत्तराखंड न तो बाढ़ का सामना कर सकता है न भूकंप का और न ही भूस्खलन का। पहाड़ के लिए कैसी सड़कें हों वहां की इमारतें कैसी रखी जाएं। हरियाली का दायरा कैसे बढ़ाया जाए। नदियों के प्रवाह को कैसे प्रवाहमान रखा जाए इस पर काम ही नहीं किया गया। नदियों का रूट क्या है इस पर कोई काम नहीं हुआ निर्माण जारी है। भूस्खलन रोकने के लिए वन क्षेत्र बढ़ाने पर कोई काम नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बाँध के निर्माण पर रोक लगनी चाहिए। बांधों के निर्माण पर काम जारी है।

तबाही दर तबाही

  • 23 जून 1980 – उत्तरकाशी के ज्ञानसू में भूस्खलन ।
  • 1991- 1992 – चमोली के पिंडर घाटी में भूस्खलन।
  • 11 अगस्त 1998 – रुद्रप्रयाग के उखीमठ में भूस्खलन।
  • 17 अगस्त 1998 – पिथौरागढ़ के मालपा में भूस्खलन में लगभग 350 लोगों की मृत्यु।
  • 10 अगस्त 2002 – टिहरी के बुढाकेदार में भूस्खलन।
  • 2 अगस्त 2004 – टिहरी बाँध में टनल धसने से 29 लोगों की मृत्यु।
  • 7 अगस्त 2009 – पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में अतिवृष्टि।
  • 17 अगस्त 2010 – बागेश्वर के कपकोट में सरस्वती शिशु मंदिर भूस्खलन की चपेट में 18 बच्चों की मृत्यु।
  • 16 जून 2013 – केदारनाथ में अलकनंदा नदी जलसैलाब आने की आपदा से पांच हजार से अधिक लोगों की मृत्यु।
  • 16 जून 2013 – पिथौरागढ़ के धारचूला धौलीगंगा व काली नदी में आपदा।

उत्तराखंड में बाढ़ का इतिहास

=1857 नंदाकिनी नदी की बाढ़ ने अलकनंदा घाटी में तबाही मचाई
=1868 बिरही नदी में गोदियर ताल में भूस्खलन के कारण बाढ़
=1894 बिरही नदी के कारण पुराने श्रीनगर और अलकनंदा घाटी में तबाही
=1970 अलकनंदा नदी में बाढ़ हनुमान चट्टी से हरिद्वार तक असर
=सन 2000 से 2013 के बीच 21 छोटी बड़ी बाढ़

एनआईडीएम, वीरेंदर कुमार समिति और रवि चोपड़ा समिति के सुझावों के अनुसार मोटे तौर पर पहाड़ पर पर्यटकों की संख्या पर नियंत्रण लगना चाहिए, सड़क निर्माण में पानी निकास की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए, चौबीस बांधों के निर्माण पर रोक लगनी चाहिए, बाँध और सडकों के निर्माण की उचित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन सुनिश्चित होना चाहिए। नदी के रास्ते में घरों, होटलों और पार्किंग के निर्माण पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए। किसी भी हादसे से पूर्व सूचना का मज़बूत तंत्र मजबूती से विकसित किया जाना चाहिए। जंगलों को बचाने और नए जंगल लगाने की बड़े पैमाने पर कोशिश की जानी चाहिए। यह काम अविलंब किये जाने चाहिए। लेकिन फिलवक्त अभी इस पर कोई ठोस प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है।