श्रीराम जानकी से स्वयं बोले, तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत कोटि जन्म अघ भागा

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श्रीराम जानकी से स्वयं बोले, तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत कोटि जन्म अघ भागा
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रतिभान त्रिपाठी
तीर्थराज प्रयाग धार्मिक क्षेत्र के रूप में सर्वख्यात है। प्रयाग तो बहुत हैं लेकिन संगम तट के प्रयाग तो प्रयागराज कहा जाता है। और इसे ही तीर्थराज यानी सभी तीर्थों के राजा होने का गौरव प्राप्त है। पुराणों में कहा गया है कि अयोध्या, मथुरा, मायापुरी, काशी, कांची, अवंतिका और द्वारका- ये सप्त पुरियां हैं और इन्हें तीर्थराज प्रयाग की पत्नियों की संज्ञा दी गई है। सातों पुरियों में काशी श्रेष्ठ है। ये तीर्थराज की पटरानी है, इसीलिए तीर्थराज ने इन्हें सबसे निकट स्थान दिया है। जिस तरह ब्रह्माण्ड से जगत की उत्पत्ति होती है, जगत से ब्रह्माण्ड का जन्म नहीं हो सकता, उसी तरह प्रयाग से सारे तीर्थ उत्पन्न हुए माने गए हैं। प्रयाग किसी तीर्थ से उत्पन्न नहीं हो सकता।

प्रयाग नाम क्यों : ब्रह्मा द्वारा यहां अनेक प्रकृष्ट यज्ञ किए जाने के कारण इसका नाम प्रयाग हुआ है। यहां ऋषियों और देवताओं ने भी अनेक यज्ञ किए थे, इसलिए यह तीर्थ बहुत पवित्र माना जाता है। प्रयाग को अगर शाब्दिक रूप से परिभाषित करें तो अर्थ है- प्रकृष्टो याग: इति प्रयाग:। यानी जिस स्थान पर अनेक यज्ञ किए गए हों, वही प्रयाग है। परन्तु स्वयं ब्रह्मा द्वारा पूजित इस भूमि को प्रयागराज कहा जाता है। विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ राम चरित मानस में तीर्थराज प्रयाग का वर्णन बड़े ही श्रेष्ठ भाव से किया गया है-

माघ मकरगत रवि जब होई। तीरथ पतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी।।
पूजहिं माधव पद जलजाता। परसि अछयबट हरषहिं गाता।।
तहां होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।।
मज्जन फल पेखिय ततकाला। काक होहिं पिक बकहु मराला।।
सुनि आचरज करइ जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई।।
अकथ अलौकिक तीरथ राऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।

गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि जब श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करके पुष्पक विमान से लौट रहे थे तो वह विमान से ही सीताजी को तीर्थों के दर्शन कराते और उनका वर्णन करते हुए प्रयाग पहुंचने पर कहते हैं-

बहुरि राम जानकिहिं देखाई। जमुना कलिमल हरनि सुहाई।।
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत कोटि जन्म अघ भागा।
देखु परम पावन पुनि बेनी। हरनि शोक परलोक निसेनी।।

यानी तीर्थराज के प्रयाग के दर्शन मात्र से किसी भी मनुष्य का करोड़ों जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है। ऐसे महातीर्थ के तट पर हर साल लगने वाला एक माह का मेला और धार्मिक अनुष्ठान देखने और करने योग्य है।

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संतों के पंथ-मत : हमारे देश में संतों-महंतों के विविध पंथ और संप्रदाय हैं। पहला विभाजन शैव, वैष्णव और शाक्त के रूप में है। इसके बाद संन्यासी और वैरागी का विभाजन है। शैवों में भी अनेक मत हैं और वैष्णवों में भी। रामानंद, रामानुज, निम्बाकाचार्य, वल्लभाचार्य, चैतन्य, कैवल्य जैसे अनेक पंथ तो वैषणवों के हैं। इन सारे मतों-पंथों, संप्रदायों के संत माघ के महीने में संगम तीरे बसते हैं। यही संन्यासी परंपरा में शंकराचार्य और दंडी करते हैं। वैसे विविध संप्रदायों और मत पंथों के अपने शास्त्र वचन और ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों का मूल स्वर तीर्थराज प्रयाग की महिमा का बखान करना है।

सबका लक्ष्य एक : गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर इन मत पंथों के कर्मकाण्ड, इनकी पूजा पद्धति, इनके भजन-कीर्तन, प्रवचन और सत्संग को देखकर विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि हमारे देश के सभी तीर्थों में अंतरसम्बन्ध है। सभी तीर्थों की पुण्यधारा तीर्थराज प्रयाग के संगम की ओर बढऩे लगती है। संगम और समन्वय ही हमारी संस्कृति का मूल स्वर है। यही समन्वय प्रयाग को तीर्थराज का गौरव देता है।

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