क्या भारतीय अदालतों की सफाई की जरूरत है #CleanseOurCourts?

रामकृष्ण वाजपेयी

देश की अदालतों में 3.15 करोड़ मामले लंबित हैं। इसमें से तमाम ऐसे हैं
जो दस सालों से अधिक समय से लंबित हैं। इसमें 60 हजार मामले सुप्रीम
कोर्ट में और विभिन्न हाई कोर्ट में 42 लाख मामले और निचली अदालतों में
करीब 2.7 करोड़ मामले लंबित हैं। ट्विटर पर हैश टैग क्लीन्सअवरकोर्ट के
तहत आज इस मुद्दे पर एक लंबी बहस छिड़ी है। इसमें तरह तरह की बातें और
मुद्दे उठ रहे हैं प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश :

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  • लंबित मामलों को लेकर समय समय पर आवाज उठती रही हैं और यहां तक कहा गया है कि लगता है भगवान विष्णु को अवतार लेकर इस कलियुग का उद्धार करना पड़ेगा। क्योंकि इस लाइलाज हो चके इस मर्ज की दवा अब किसी की समझ में नहीं आ रही है।
  •  नतीजतन आम आदमी का न्याय प्रणाली में विश्वास और आस्था सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है। गरीब आदमी और जेल में परीक्षण के दौरान रखे गए कैदियों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।
  • आर्थिक सुधार केवल कागज पर हुए हैं उन्होंने न्याय प्रणाली को गतिशील करने के लिए कुछ नहीं किया है।
  • विदेशी निवेशकों में समयबद्ध न्याय पर बढ़ता संदेह मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रम की सफलता को प्रभावित कर रहा है।
  • न्यायपालिका मुकदमों के बोझ को निपटा नहीं पा रही है। न्यायपालिका इनके बोझ तले दबकर अपनी कार्यक्षमता को खोती जा रही है।
  • शीघ्र न्याय मिलना ही न्याय है और न्याय में विलंब न्याय नहीं है।
  • लोगों का न्यायपालिका से विश्वास घटने के कई कारण है जिसमें अहम है राजनेता और राजनीतिक कनेक्शन वाले लोगों का देश को धोखा देने के बाद एक के बाद एक मुक्त होते जाना। अजब मजाक है इनोवा की कास्ट 2012 में क्या थी और 2016 में क्या थी हमें पता है। पल्सर की कास्ट क्या थी पता है लेकिन राफेल विमानों की कास्ट तब क्या थी और अब क्या है यह हमें नहीं पता। मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
  • इस बहस को आगे बढ़ाते हुए पूर्व महान्यायवादी की 2014 में कही बात कि सरकार को अस्थिर करने के लिए न्यायपालिका का दुरुपयोग सही साबित हो रही है।
  • अदालतों की सफाई करनी है तो कालेजियम सिस्टम को कबाड़ में डालना जाना चाहिए। यह एक बड़ा कदम होगा। क्या है कालेजियम। कालेजियम सिस्टम तीन जजों के मामलों पर आधारित है। जिसके तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत केप्रधान न्यायाधीश और चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा जजों कीनियुक्ति की जाती है। इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है। संविधान काअनुच्छेद 124 कहता है कि जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा जजों कीसलाह से की जाएगी। आलोचकों का कहना है कि यह एक क्लोज डोर प्रणाली हैजिसमें पारदर्शिता का अभाव है।

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  • जबकि एनजेएसी का गठन दो दशक पुराने उच्चतम न्यायालय के कालेजियम सिस्टम

के तहत जजों की नियुक्ति प्रथा को खत्म करने के लिए किया गया है। एनजेएसी
लोकसभा से 13 अगस्त 2014 को पारित हुआ और एक दिन बाद राज्यसभा ने इसे
पारित किया। इसमें छह लोग शामिल किये गए। प्रधान न्यायाधीश, सुप्रीम
कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, विधि मंत्री और दो प्रसिद्ध लोग। आलोचकों
का कहना है कि एनजेएसी में जजों को किसी नाम को आगे बढ़ाने के लिए अन्य
का समर्थन हासिल करना होगा। इसके चलते उन्हें भय है कि इससे न्यायिक
स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

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आलोचकों का यह भी कहना है कि इस न्यायिक स्वतंत्रता के नाम पर एक ही
परिवार को व्यक्ति को कई बार जज बनने का अवसर भी मिल जाता है जो कि योग्यता के पैमाने पर उतना खरा नहीं उतरता है।