वेद प्रकाश सिंह

शिमला: पूर्व प्रधानमत्री अटल बिहारी बाजपेयी का मनाली में अस्थि विसर्जन करने उनकी दत्तक पुत्री नमिता भट्टाचार्य बुधवार मनाली के प्रीणी स्थित घर पहुंचीं। प्रीणी में मामा के नाम से मशहूर अटल बिहारी बाजपेयी की इस आखिरी निशानी के साथ उनसे जुड़ी कहानियां भी लोगों की जुबान पर हैं। ऐसी ही एक कहानी है अटल के अपने घर से बाहर न निकलने की जिसे बहुत लोग जानते हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा अटल के जन सहयोगी और लोगों की सहूलियतों का ध्यान रखने के कारण होती है। जब भी अटल मनाली पहुंचते थे तो वह वहां के लोगों से खूब मिलते जुलते थे। कवियों के साथ समय गुजारने से लेकर विभिन्न तरह के कार्यक्रमों में उन्हें पाकर लोग खुद को सौभाग्यशाली समझते थे, लेकिन जैसे-जैसे राजनीति के इस शलाका पुरुष का कद बढ़ता गया वैसे-वैसे अटल का मनाली आना-जाना लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनने लगा। प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान जब भी अटल मनाली पहुंचते तो उनकी सुरक्षा एसपीजी के जिम्मे होती। एसपीजी के सुरक्षा विधान बहुत सख्त हैं जिनमें वे किसी भी तरह का समझौता नहीं करते थे। एसपीजी के सुरक्षा मानक मनाली जैसे टूरिस्ट स्पॉट के रूप में प्रसिद्ध शहर के लिए मुसीबत बनने लगे। इससे स्थानीय लोगों के साथ-साथ वहां आने वाले विदेशी पर्यटक भी परेशान होने लगे। इसका सीधा असर मनाली के पर्यटन उद्योग पर भी पडऩे लगा।

कैसे होती थी समस्या

वरिष्ठï पत्रकार शशिकांत शर्मा ने बताया कि जब भी प्रधानमंत्री के तौर पर अटल जी मनाली आते तो कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे। उनकी सुरक्षा एसपीजी के जिम्मे होने कारण रोड ब्लाक से लेकर आसपास के इलाके को खाली कराने और अपनी निगरानी में ले लेना आम बात थी जिससे इस इलाके के होटल मालिकों को समस्या होने लगी। एसपीजी पूरा का पूरा होटल खाली करवा लेती जिससे उन होटल्स में रहने वाले लोग खासा परेशान होते। इसके अलावा जब वह भुंतर से मनाली के लिए 52 किलोमीटर लम्बे जिस नेशनल हाईवे का प्रयोग करते उसे तीन दिन रिहर्सल के समय भी बंद कर दिया जाता था।

मीडिया रिपर्ट्स देख रद्द किए कार्यक्रम

मई-जून के महीने में जब वह मनाली आते तो उससे पहले ही मीडिया में उनके यात्रा से जुड़ी जन समस्याओं के बारे में रिपोट्र्स होती थी। बात 2002 के मनाली प्रवास की है जब वह विशेष विमान से भुंतर पहुंचे तो वहां के कुछ बड़े समाचार पत्रों के स्थानीय संस्करण वहां उन्होंने पढऩे के लिए मंगवाए। जब उन्होंने इस बाबत रिपोट्र्स देखी तो अपने अंदाज में कुछ देर खामोश रहने के बाद उन्होंने सुरक्षा अधिकारी की तरफ देखा।

अटल ने कहा कि मेरी वजह से इतनी समस्या होती है लोगों को। अटल ने वहीं पर कहा कि मेरे मनाली के सारे स्थानीय कार्यक्रम निरस्त कर दिए जाएं और आगे से वह कभी भी मनाली में कोई कार्यक्रम नहीं रखेंगे। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वह एक बार दिल्ली जाते वक्त ही बाहर निकलेंगे। अपनों से बनते फासले को देखकर ही शायद अटल ने मुझे इतना ऊंचाई न देना कि अपनों को गले न लगा सकूं कविता लिखी थी।

अटल के कवि सम्मेलनों को मिस करते हैं लोग

मामा के नाम से पहचाने जाने वाले अटल बिहारी बाजपेयी के कवि सम्मेलनों को आज भी मनाली के पुराने लोग मिस करते हैं। मनाली निवासी अजयकान्त के मुताबिक स्थानीय कवियों में उनकी बड़ी उठक-बैठक थी। वे मनाली से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने मनाली पर बुलाती तुम्हें मनाली शीर्षक से कविता लिख डाली जो उनकी मेरी 51 कविताएं नामक पुस्तक में प्रकाशित हुई थी। वरिष्ठï पत्रकार शशिकांत शर्मा के मुताबिक राज्य सरकार की अनुमति से खरीदी गयी मनाली के प्रीणी गांव में अटल की जमीन का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे बिक चुका है। अब उनके घर के अलावा लान से लगती कुछ जमीन ही बची है। जमीन संबंधी सभी क्रय-विक्रय उनके दामाद रंजन भट्टाचार्य ने किया।