कविता: फूल सफेद कांस के: बीज बिखेर दिए ये किसने अंधकार में ज्यों उजास...

धानी धूसर हरी दरी पर फूले फूल सफेद कांस के, बीज बिखेर दिए ये किसने अंधकार में ज्यों उजास के ! ज्वार बाजरे की खेती यह खेती है चांदी...
सौरमंडल के सृजन का पड़ाव मकर संक्रान्ति : 14 एवं 15 जनवरी

सौरमंडल के सृजन का पड़ाव मकर संक्रान्ति : 14 एवं 15 जनवरी

यह एक पोर है। एक विंदु है। रेखा का एक छोर है।एक अंत है।एक प्रारम्भ है। यह सृष्टि का सूर्य पर्व है।यह कोटि -कोटि ब्रह्मांडो में से इस पृश्नि ब्रह्माण्ड के द्वितीय मन्वन्तर में वाराहकल्प के कलियुग के काली प्रथम चरण में प्रति वर्ष आने वाला वह पर्व है जो हमें जीवन के सिद्धांतो और उद्देश्यों का स्मरण कराता है।जिस सौ

अमा जाने दो: टिप्पणी- गोरे-गोरे गाल, कुकुरमुत्ते का कमाल!

अब गुजरात का चुनाव किसके हिस्से में गया और क्यों गया, ये सब गुणागणित आप समझिए। मेरी चिंता तो उन व्यापारियों को लेकर है,...

श्रद्धांजलि कुंवर नारायण: वह इतिहास और मिथक में देखते थे वर्तमान

कुंवर नारायण नहीं रहे। नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में बुधवार को निधन हो गया।...
शिक्षक दिवस पर विशेष: जब अभिभावक के रूप में आया एक टीचर

शिक्षक दिवस पर विशेष: जब अभिभावक के रूप में आया एक टीचर

ऐसा अध्यापक जो अपने विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए अभिभावक भी बन जाता है। विद्यार्थियों की पढ़ाई की चिंता के लिए वह अपने हाथों से शौचालय भी साफ करता है।

कला बाजार के व्यवसायीकरण से उभरती हैं नई प्रतिभाएं 

कला बाजार के व्यापक व्यावसायीकरण पर दिग्गज चित्रकार जतिन दास समेत कई बड़े कलाकारों ने निराशा जताई है, लेकिन समकालीन भारतीय कला के अगुआ...

पारिवारिक रिश्तों पर आधारित कहानी, बाबाजी का भोग

रामधन अहीर के द्वार एक साधू आकर बोला - बच्चा तेरा कल्याण हो, कुछ साधू पर श्रद्धा कर। रामधन ने जाकर स्त्री से कहा...

ममता त्रिपाठी की दो कविताएं : गहन निशा है / संकल्प-वर्तिका

उज्जवल ललाट की / उज्ज्वल प्रभा बुलाती। मानस के मोती को / सर-समुद्र खोजती॥ भटकाव खोज हित / एक बार फिर कस्तूरी के। एक बार फिर से / तार जुड़े दूरी के॥

कविता: मौसम बेघर होने लगे हैं, बंजारे लगते हैं मौसम, मौसम बेघर होने लगे...

मौसम बेघर होने लगे हैं बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं जंगल, पेड, पहाड़, समंदर इंसां सब कुछ काट रहा है छील छील के खाल ज़मीं...

मैं भी उड़ना चाहती हूँ, वक्त का पंख लगा कर, जैसे वक्त उड़ जाता...

मैं भी चाहती हूँ उड़ना वक्त का पंख लगा कर, जैसे वक्त उड़ जाता है, ओझल हो जाता है.... अदृश्य पंखों के साथ।   मैं भी उड़ना चाहती हूँ, वक्त के साथ........... गोया...

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