अमा जाने दो : इश्क की तरह निकली नोटबंदी, कभी समझ न पाया

कन्फ्यूजन के एक साल पूरे हो गए हैं, लेकिन पता नहीं चला कि नोटबंदी से मुझे फायदा हुआ या नुकसान। दरअसल इधर मोदी एंड...

लोककथा : पैसा सब कुछ कर सकता है, इसकी बात ही कुछ और है

एक बार एक बहुत रईस शहजादे ने राजा के महल के ठीक सामने उससे भी शानदार एक महल बनवाने का निश्चय किया। महल जब...
Human Rights Day: "जियो और जीने दो " मूल अवधारणा है

Human Rights Day: “जियो और जीने दो ” मूल अवधारणा है

मानवाधिकार मनुष्य को बिना किसी भेदभाव के सम्मान के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित कराता है । आज मानवाधिकार की जो,परिष्कृत एवं विस्तारवादी अवधारणा हम

अपनी तरह का अनोखा अनुलोम-विलोम काव्य है राघवयादवीयम, जाने कैसे

संजय तिवारी  दुनिया की किसी भाषा में यह क्षमता नहीं है। भाषा की इस क्षमता को अनुलोम - विलोम काव्य कहा जाता है। संस्कृत भाषा...

शिव मंदिरों का विलक्षण वास्तु, वास्तुशिल्प के हैं अन्यतम प्रतीक

लखनऊ: शिव सर्वसामान्य के सर्वसुलभ देवता हैं। ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल तक सभी को इसकी पूजा का समान अधिकार है। ये रुद्र भी हैं...

जब-जब राम ने जन्म लिया, तब-तब पाया वनवास! फिर भी खत्म नहीं हुई मंजिल...

लखनऊ: अवतारों तथा महापुरुषों के कष्टमय जीवन हमें प्रभु की राह में  सब प्रकार के कष्ट सहने की सीख देते हैं! ऐसे ही कुछ...

विश्व हास्य दिवस: किसी को मुस्कुराहटें करें निसार, समेटते रह जाएंगे इतना मिलेगा प्यार

लखनऊ: नवाबों की नगरी लखनऊ के रेलवे स्टेशन से आदमी बाहर निकलता है, तो बड़े अक्षरों में लिखे बोर्ड पर नज़र टिकती है- "मुस्कुराइए...

मलेरिया दिवस 25 अप्रैल : मलेरिया से मुक्ति बड़ी चुनौती

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में हर साल मच्छरों के काटने से फैलने वाली बीमारियों में
जन्म दिन विशेष: ‘कल सुनना मुझे’, सुदामा पांडे का प्रजातंत्र- ‘धूमिल’

जन्म दिन विशेष: ‘कल सुनना मुझे’, सुदामा पांडे का प्रजातंत्र- ‘धूमिल’

ये कविता वाराणसी के रहने वाले सुदामा पांडे ,धूमिल की हैं । हिंदी साहित्य जगत के यंग्री यंगमैन कहे जाने वाले धूमिल ने ही लिखा था कि तिरंगा तीन थके रंगों का नाम है जिसे एक पहिया ढोता है ।
राजव्यवस्था कबीर से सीख ले तो रामराज्य तक इंतजार नहीं करना होगा

राजव्यवस्था कबीर से सीख ले तो रामराज्य तक इंतजार नहीं करना होगा

मित्र ने आपत्ति दर्ज कराई-कबीर तो जेष्ठ में उमस के बीच आग बरसते दिनों में काशी में पैदा हुए थे यहां तो मंद-मंद शरद ऋतु में प्रकटोत्सव मनाया जा रहा है।मैंने कहा- कबीर

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