बसंत पंचमी विशेष: वासंती उल्लास और वाग्देवी की आराधना

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पूनम नेगी

वसंतोत्सव भारत की सर्वाधिक प्राचीन और सशक्त परंपरा है। प्रेम, उमंग, उत्साह, बुद्धि और ज्ञान के समन्वय के इस रंग-बिरंगे पर्व का अभिनंदन प्रकृति अपने समस्त श्रृंगार के साथ करती है। ऋतुराज वसंत के स्वागत में प्रकृति का समूचा सौंदर्य निखर उठता है, समूची प्रकृति जीवंत हो जाती है।

इस पर्व को सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाए जाने के विस्तृत उल्लेख हमारे पुरा साहित्य में मिलते हैं। कहा जाता है कि सृष्टि की रचना के उपरान्त जीव जगत को स्वर देने के लिए प्रजा पिता ब्रह्मा जी के आह्वान पर इसी शुभ दिन वीणा, पुस्तक के साथ वरमुद्राधारी मां सरस्वती प्रकट हुईं और अपने वीणा के तारों को झंकृतकर सम्पूर्ण सृष्टि में वाणी की शक्ति से भर दिया। इसीलिए इस पर्व को वाग्देवी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

वैदिक ऋषि कहते हैं कि सरस्वती की साधना से कंठ से सोलह धारा वाले विशुद्ध शाम्भवी चक्र का उदय होता है जिसका ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है। इसी कारण भारतीय मनीषा ने कला व संगीत की देवी सरस्वती को ज्ञान साधना से जोड़कर अमूर्त व अवर्णनीय कर दिया है। प्राचीनकाल से आज तक वसंत का यही तत्वदर्शन भारत की देवभूमि को अपनी भावधारा से आबाध रूप से सिंचित करता आ रहा है।

सरस्वती एक ओर जहां विलुप्त नदी के रूप में जन संस्कृति का प्रतीक है, तो दूसरी ओर हमारी देवभूमि की सांस्कृतिक चेतना के विकास का भी। ज्ञान-ध्यान,संयम व विवेक के साथ सरस्वती पूजन का यह पर्व कला संस्कृति के रूप में सदियों से जनमानस की आध्यात्मिक जिज्ञासा की प्यास तो बुझाता ही आ रहा है। हर्ष-उल्लास के साथ मन की कोमल भावनाओं को भी तरंगित करता है। इस अवसर पर प्रकृति के सुंदर सजे आँगन में मानव मन नूतन सौंदर्य बोध को अनगिन आकार देता है।

ऋग्वेद में कई स्थलों पर सरस्वती को पवित्रता, शुद्धता, समृद्धता और शक्ति की देवी माना गया है तथा इन्द्र और मरुत देवता से भी सम्बन्धित किया गया है। वीणा, पुस्तक और कमल पुष्प और हंस से सुशोभित देवी सरस्वती “श्रुति महती धीमताम्” स्वरूप को चरितार्थ करती हैं। हमारा जीवन सद्ज्ञान और विवेक से संयुक्त होकर शुभ भावनाओं की लय से सतत संचरित होता रहे, इन्हीं दिव्य भावों के साथ की गयी मां सरस्वती की भावभरी उपासना हमारे अंतस में सात्विक भाव भर देती है और हमारी आस्था पवित्र एवं प्रखर स्वरूप को प्राप्त करती है। वातावरण की यह सूक्ष्म चेतना प्रकृति के साथ मानव के अंतस में घुलकर वासन्ती उल्लास बिखेर कर सतत प्रवाहमान होती है, यही इस पर्व का मूल दर्शन है।

सोलह कलाओं के पूर्णावतार योगेश्वर श्रीकृष्ण को वसंत का अग्रदूत माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख मिलता है कि सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने वसंतपंचमी के दिन ज्ञान व कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का पूजन कर इस परम्परा का शुभारम्भ किया था। सरस्वती पूजा भारतीय साहित्य साधना के क्रमिक विकास का प्राण तत्व है जो आदि कवि वाल्मीकि की काव्यधारा का मूल स्वर बना तथा महाभारत में वेद व्यासजी की सर्जना का भी। भारतीय संस्कृति में देवी सरस्वती का स्वरूप बड़े ही प्रखर और दिव्यता से वर्णित हुआ है। एक ओर वे संस्कृति के प्रतिमानों में उतरी हैं तो वहीं दूसरी ओर भारतीय वैदिक साहित्य में भी।

वैष्णव धर्मावलंबी वसंत पंचमी को “श्रीपंचमी” के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि इसी दिन राधा-कृष्ण का मिलन हुआ था। आज भी इस दिन वृंदावन के श्रीराधा श्यामसुंदर मंदिर में राधा-कृष्ण महोत्सव का भव्य आयोजन होता है। कुछ अन्य पौराणिक मान्यताएं वसंत पंचमी पर रति-काम पूजन की बात भी कहती हैं। भविष्य पुराण में वसंत का चैत्रोत्सव के रूप में अत्यन्त सुंदर और सजीव वर्णन मिलता है।

इस विवरण के अनुसार वसंत ऋतु में शुक्ल त्रयोदशी के दिन वाग्देवी के पूजन के उपरान्त उल्लास के देव काम और सौंदर्य की देवी रति की मूर्तियों को सिन्दूर से सजाकर सामूहिक रूप से पूजन कर मदन महोत्सव मनाया जाता था। इस अवसर पर सभी जन नये एवं सुंदर वस्त्राभूषणों से सज-धजकर समारोह पूर्वक नृत्य गायन करते थे। गरुड़ पुराण के अनुसार वसन्तोत्सव अगहन त्रयोदशी से प्रारम्भ होकर कार्तिक त्रयोदशी को समाप्त होता था। खास बात यह है कि मां सरस्वती की उपासना व वसंत उत्सव वैदिक धर्मावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है। बौद्ध व जैन मतावलम्बी भी देवी सरस्वती की उपासना व इस ऋतु पर्व को हर्षोल्लास से मनाते हैं। बौद्ध धर्म ग्रन्थ “साधनमाला” में इनका महासरस्वती, वज्रशारदा व वीणा सरस्वती आदि रूपों में उल्लेख मिलता है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि वसंत पंचमी और वेलेंटाइन-डे ये दोनों ही एक ही मौसम में मनाए जाने वाले प्रेम व मानव मन की उमंग उल्लास के पर्व हैं। मगर दोनों की मूल अवधारणा में व्यापक अंतर है। वसंत पर्व जहां भारतीय जीवनमूल्यों का पोषक है वहीं पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रंगा “वेलेंटाइन-डे” एन्द्रिक सुख तक सीमित। हमारे यहां प्रेम को जीने व पुष्पित व पल्लवित करने की पूरी एक ऋतु है, जिसका शुभारम्भ बसंत पंचमी से होता है और होलिकोत्सव पर उल्लास की चरम परिणति के साथ वंसतोत्सव का आनन्द परिपूर्ण होता है।

हमारी संस्कृति में इस पर्व पर ज्ञान व विवेक की देवी मां सरस्वती की आराधना की विधान है ताकि हमारे मनों में उमड़ती भावनाएं अनियंत्रित- उच्श्रृंखल न हों, उन पर विवेक का अंकुश लगा रहे। जबकि वेलेंटाइन-डे के नाम पर पाश्चात्य संस्कृति में प्रेम के प्रदर्शन के लिए महज एक दिन।